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सीकर का अनोखा गांव जहां लोग राम और रावण की सेना में बंटकर करते है युद्ध , दक्षिण शैली में होता है नाटक का मंचन

सीकर जिले स्थित बाय गांव में अनोखे तरीके से  मनाते है दशहरा। यहां इस दिन राम और रावण की सेना में बंटकर युद्ध करता है पूरा गांव। एक महीने पहले हर घर में तैयारी शुरू हो जाती है। यहां पुतले के बजाए सजीव रावण का युद्ध में वध किया जाता है। दक्षिण भारत शैली में होता है नाट्य मंच।

sikar news dussehra 2022 special story about a village where villagers celebrate by fighting in two group of shri ram and ravana asc
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First Published Oct 3, 2022, 5:44 PM IST

सीकर. दशहरे का पर्व यूं तो देशभर में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है लेकिन राजस्थान के सीकर जिले के छोटे से गांव बाय में इसे मनाने का अंदाज बेहद जुदा है। जहां विजय दशमी पर रावण के पुतले को नहीं जलाया जाता, बल्कि सजीव युद्ध में रावण का वध किया जाता है। खास बात ये है कि इस युद्ध में पूरे गांववासी राम और रावण की सेना में बंटकर अलग- अलग पात्रों के स्वांग धरते हैं। जो युद्ध भूमि बने गांव के खुले मैदान में एक दूसरे पर आक्रमण करते हुए राम- रावण युद्ध की नाट्य प्रस्तुती देते हैं। दक्षिण भारतीय शैली में मुखौटे व मंचन वाले बाय के इस मेले की तैयारी एक महीने पहले हर घर में शुरू हो जाती है। 5 अक्टूबर को इस बार गांव में 167वें मेले का आयोजन होगा। 

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हर घर का सदस्य लेता है हिस्सा, अपने स्तर पर करता है तैयारी
बाय गांव में दशहरे मेले की तैयारी एक महीने पहले ही शुरू हो जाती है।  गांव के लगभग हर घर का सदस्य राम- रावण के युद्ध में हिस्सा लेता है। जिसकी तैयारी वह अपने स्तर पर घर पर ही मुखौटा, वेशभूषा व हथियार तैयार करके करता है। ऐसे में मेले से एक महीने पहले ही हर घर में इसकी तैयारी देखने को मिलने लगती है।

दिनभर लीला का मंचन, रात को नृसिंह लीला व झांकी
बाय के मेले की खास बात  है इसका 24 घंटे दिन रात चलना। दोपहर में शुरू होने वाले इस मेले में दिनभर राम व रावण का युद्ध चलने के बाद शाम को रावण वध होता है। इसके बाद रात को नृसिंह लीला का आयोजन होता है। जिसके साथ भगवान विष्णु के 24 अवतारों की झांकी लगती है। ये लीला व झंाकी प्रदर्शन अगले दिन सूर्योदय तक चलता है। 

मुस्लिम भी मेला कमेटी सदस्य
बाय का मेला सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी है। जिसमें मेला कमेटी के सदस्यों में काफी संख्या में मुस्लिम भी शामिल है। गांव के अनारदीन गौरी, फूल मोहम्मद, बाबूलाल मणियार, समसुद्दीन तेली आदि दशहरा समिति के सदस्य के तौर पर मेले की जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम देते हैं। 

गांव उठाता है 40 लाख का खर्च, देश- विदेश से आते हैं लोग
मेला कमेटी के सदस्य मातादीन शर्मा ने बताया कि मेले में 40 लाख रुपए से ज्यादा का खर्च होता है। जो पूरे गांव द्वारा ही उठाया जाता है। इसके लिए एक कमेटी बनाई गई है। जो पूरे मेले की व्यवस्था संभालती है। मेला इस मायने में भी खास है कि गांव के लोग देश- विदेश में कहीं भी हो, इस मौके पर जरूर गांव में पहुंचते हैं।

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