बिहार चुनाव 2025 में 74 साल का मतदान रिकॉर्ड टूटा। महिलाओं ने पुरुषों से लगभग 9% अधिक मतदान कर इतिहास रचा। कुल 66.91% वोटिंग हुई, जिसमें महिला मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।

पटनाः बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने मतदान के मामले में एक नया अध्याय लिखा है। भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस चुनाव ने 1951 के बाद का सबसे बड़ा मतदान रिकॉर्ड बनाया, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत रही महिला मतदाताओं की रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं ने मतदान प्रतिशत में पुरुषों को भारी अंतर से पीछे छोड़ते हुए इतिहास रच दिया है।

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पुरुषों से लगभग 9% अधिक मतदान

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महिला मतदाताओं ने पुरुषों के मुकाबले लगभग 9 प्रतिशत अंक अधिक मतदान किया, जो यह दर्शाता है कि इस बार चुनाव का रुख तय करने में महिला शक्ति की भूमिका निर्णायक रहने वाली है। 71.6% महिलाओं ने इस बार मतदान किया, वहीं 62.8% पुरुष मतदाताओं ने वोट डाला। यानि पुरश और महिलाओं के बीच वोटिंग प्रतिशत का अंतर 8.8% रहा। कुल मिलाकर राज्य में 66.91% मतदान दर्ज किया गया, जो बिहार के चुनावी इतिहास में अब तक का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत है।

चरण-वार महिला भागीदारी

महिला मतदाताओं की यह सक्रियता दोनों चरणों में स्पष्ट रूप से दिखाई दी। पहले चरण में 69.04%महिला और 61.56% पुरुष मतदाताओं ने वोट डाला। वहीं दूसरे चरण में 74.03% महिला और 64.1% पुरुष मतदाताओं ने वोट डाला।

दूसरे चरण में महिला मतदाताओं की भागीदारी 74.03% तक पहुँच गई, जो यह बताता है कि महिलाएं बड़ी संख्या में घर से निकलीं और अपने मताधिकार का प्रयोग किया।

महिला वोट किसके पक्ष में?

महिला मतदाताओं का यह विशाल टर्नआउट, जिसने 74 साल का रिकॉर्ड तोड़ा है, चुनावी पंडितों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी अक्सर विकास, सुरक्षा, शराबबंदी और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर केंद्रित होती है।

किसके लिए शुभ संकेत?

यह महिला वोटिंग किसके पक्ष में जाएगी, यह 14 नवंबर को तय होगा। हालांकि, यह तय है कि दोनों गठबंधनों—एनडीए (जो सुरक्षा और सरकारी योजनाओं पर ज़ोर देता है) और महागठबंधन (जो नौकरी और महंगाई पर ज़ोर देता है) को महिला मतदाताओं को साधने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी है।

महिला मतदाताओं ने इस चुनाव में अपनी आवाज़ बुलंद कर दी है, जिससे बिहार की राजनीति में 'आधी आबादी' की निर्णायक भूमिका और मजबूत हुई है।