दिल्ली के LG तरनजीत सिंह संधू ने DTU में 4,000 वर्ग फीट के सिद्धार्थ रिसर्च एंड ट्राइबोलॉजी सेंटर का उद्घाटन किया। इससे तकनीकी शोध को बढ़ावा मिलेगा।
दिल्ली में रिसर्च, तकनीकी नवाचार और उद्योगों के साथ शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक नई पहल हुई है। दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) में ‘सिद्धार्थ रिसर्च एंड ट्राइबोलॉजी सेंटर’ का उद्घाटन किया। इस मौके पर दिल्ली सरकार के मंत्री आशीष सूद भी मौजूद रहे।
करीब 4,000 वर्ग फीट में तैयार किया गया यह अत्याधुनिक सेंटर ट्राइबोलॉजी यानी घर्षण, घिसाव और चिकनाई (Friction, Wear and Lubrication) से जुड़े शोध को आगे बढ़ाने में मदद करेगा। इसकी स्थापना सिद्धार्थ ग्रीस एंड ल्यूब्स की CSR पहल के तहत की गई है। कंपनी का नेतृत्व DTU के पूर्व छात्र सुधीर सचदेवा कर रहे हैं।
इस सेंटर को शुरू करने का मकसद सिर्फ विश्वविद्यालय में एक नई रिसर्च सुविधा जोड़ना नहीं है। इसके जरिए उद्योगों की वास्तविक जरूरतों और अकादमिक शोध के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश की गई है। इससे ऊर्जा दक्षता, टिकाऊ विनिर्माण और नई तकनीकों के विकास से जुड़े शोध को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
DTU में Siddharth Research & Tribology Centre का उद्घाटन
दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम में उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने नए रिसर्च सेंटर का उद्घाटन किया। कार्यक्रम में दिल्ली सरकार के मंत्री आशीष सूद भी शामिल हुए। करीब 4,000 वर्ग फीट में फैली इस सुविधा को आधुनिक रिसर्च जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। सेंटर में ट्राइबोलॉजी से जुड़े अध्ययन और तकनीकी प्रयोगों को आगे बढ़ाने पर फोकस रहेगा। यह क्षेत्र मशीनों और औद्योगिक उपकरणों की कार्यक्षमता बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस केंद्र की स्थापना सिद्धार्थ ग्रीस एंड ल्यूब्स ने अपनी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पहल के तहत की है। कंपनी के प्रमुख सुधीर सचदेवा दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र हैं। इस पहल के जरिए एक पूर्व छात्र ने अपने संस्थान के साथ जुड़कर शोध और तकनीकी विकास में योगदान दिया है।
क्या है ट्राइबोलॉजी और उद्योगों के लिए क्यों है जरूरी?
ट्राइबोलॉजी इंजीनियरिंग और तकनीक का वह क्षेत्र है, जिसमें दो सतहों के आपस में संपर्क के दौरान होने वाले घर्षण, घिसाव और चिकनाई का अध्ययन किया जाता है। मशीनों, वाहनों, औद्योगिक उपकरणों और कई तरह की इंजीनियरिंग प्रणालियों में इसका सीधा इस्तेमाल होता है।
उदाहरण के तौर पर किसी मशीन के दो हिस्सों के बीच घर्षण कम करना, उनके घिसने की गति को नियंत्रित करना और सही लुब्रिकेंट का इस्तेमाल करना ट्राइबोलॉजी के दायरे में आता है। इन प्रक्रियाओं में सुधार से मशीनों की उम्र बढ़ाई जा सकती है और उनकी ऊर्जा खपत भी कम की जा सकती है।
औद्योगिक क्षेत्र में यह शोध इसलिए अहम है, क्योंकि मशीनों में घर्षण और घिसाव के कारण ऊर्जा की बर्बादी, रखरखाव का खर्च और उत्पादन में रुकावट जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। ऐसे में इस विषय पर होने वाला शोध सीधे तौर पर उद्योगों की लागत और उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है।
ऊर्जा दक्षता और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगा बढ़ावा
नए सेंटर में ट्राइबोलॉजी के साथ ऊर्जा दक्षता और टिकाऊ विनिर्माण से जुड़े शोध को भी बढ़ावा देने का लक्ष्य है। आज उद्योगों के सामने कम ऊर्जा में बेहतर उत्पादन करने और संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल करने की चुनौती है। ऐसे में बेहतर लुब्रिकेशन तकनीक, मशीनों में घर्षण कम करने के उपाय और उपकरणों की कार्यक्षमता बढ़ाने से जुड़े प्रयोग महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन क्षेत्रों में शोध से औद्योगिक प्रक्रियाओं को अधिक कुशल और टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
सेंटर की स्थापना से विश्वविद्यालय में शोध करने वाले छात्रों और तकनीकी विशेषज्ञों को उद्योग से जुड़ी समस्याओं पर काम करने का अवसर भी मिल सकता है। हालांकि, इसके वास्तविक परिणाम यहां होने वाले शोध, प्रयोगों और उद्योगों के साथ विकसित होने वाली साझेदारियों पर निर्भर करेंगे।
DTU और इंडस्ट्री के बीच मजबूत होगा सहयोग
इस सेंटर की एक बड़ी खासियत उद्योग और शिक्षा जगत के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है। आमतौर पर विश्वविद्यालयों में होने वाला शोध और उद्योगों की व्यावहारिक जरूरतें अलग-अलग दिशा में काम करती हैं। ऐसे में दोनों के बीच सीधा जुड़ाव तकनीकी विकास को अधिक उपयोगी बना सकता है।
सिद्धार्थ रिसर्च एंड ट्राइबोलॉजी सेंटर इसी अंतर को कम करने की दिशा में एक पहल है। इसके माध्यम से अकादमिक शोध को औद्योगिक जरूरतों से जोड़ने, नई तकनीकों पर प्रयोग करने और नवाचार को बढ़ावा देने का अवसर मिलेगा। DTU के पूर्व छात्र सुधीर सचदेवा की कंपनी की CSR भागीदारी यह भी दिखाती है कि पूर्व छात्र और निजी कंपनियां अपने शैक्षणिक संस्थानों की शोध क्षमता बढ़ाने में किस तरह योगदान दे सकती हैं। इस तरह की पहल उच्च शिक्षा संस्थानों को आधुनिक रिसर्च सुविधाएं उपलब्ध कराने और उद्योगों के साथ उनके संबंध मजबूत करने में मददगार हो सकती हैं।
दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में इस सेंटर की शुरुआत को तकनीकी शिक्षा, औद्योगिक शोध और नवाचार के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में यह सुविधा ऊर्जा दक्षता, बेहतर लुब्रिकेशन तकनीक और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े नए प्रयोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।






