यह कहानी जापान की रहने वाली शू यान की है, जिसने चीन-जापान युद्ध में अपने माता-पिता को खो दिया था. उसे चीनी परिवारों ने गोद लेकर अपनी बेटी की तरह पाला. सालों बाद उसे अपनी असली पहचान का पता चला. 

जब युद्ध में उसने अपने माता-पिता को खोया, तो वह बहुत छोटी थी. वह कई अनजान लेकिन अच्छे लोगों के प्यार और देखभाल से बड़ी हुई. आज वह लड़की एक दादी बन चुकी है. 'बियॉन्ड ब्लड एंड बॉर्डर्स' नाम की डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ में चीन में रहने वाली जापानी मूल की शू यान की दिल छू लेने वाली कहानी बताई गई है. यह सीरीज़ 1945 के चीन-जापान युद्ध में जापान की हार के बाद चीन में छूट गए 10 जापानी अनाथों की ज़िंदगी को दिखाती है. इनमें शू यान की कहानी सबसे ज़्यादा भावुक करने वाली थी.

युद्ध खत्म होने के बाद, चार हज़ार से ज़्यादा जापानी बच्चे चीन में बेसहारा रह गए थे. इनमें से ज़्यादातर पूर्वोत्तर चीन और इनर मंगोलिया के इलाकों में थे. इन बच्चों में से कई को बाद में चीनी परिवारों ने गोद ले लिया और अपने बच्चों की तरह पाला. शू यान का जन्म लिओनिंग प्रांत के शेनयांग शहर में हुआ था. उसका असली नाम सकुरा यामामोटो था. माना जाता है कि जिस विमान में उसके पिता सफर कर रहे थे, उसे मार गिराया गया था, जिससे उनकी मौत हो गई. वहीं, उसकी माँ की मौत बच्चे को जन्म देने के बाद हुई दिक्कतों की वजह से हो गई थी.

एक साल की होने से पहले ही एक चीनी परिवार ने उसे गोद ले लिया. लेकिन जब हालात खराब हुए, तो पड़ोसी शू ज़ेनफू और उनकी पत्नी ने उसे अपनाने का फैसला किया. उन्होंने ही उसे 'शू यान' नाम दिया. उन्होंने उसे अपनी बेटी की तरह पाला. लेकिन, शू ज़ेनफू की मौत के बाद उनकी पत्नी के लिए भी मुश्किलें बढ़ गईं. बाद में, वह डालियान शहर में अपनी प्यारी दादी की देखरेख में पली-बढ़ी. वहां पड़ोसियों और रिश्तेदारों, सबने उसे बहुत प्यार दिया.

बाद में, शू यान ने पूर्वी चीन के शानडोंग में कई सालों तक एक दाई (मिडवाइफ) के तौर पर काम किया. कई सालों बाद उसे अपनी असली पहचान के बारे में पता चला. अपनी ज़िंदगी के बारे में उसने कहा, 'चीन के लोगों ने मेरी जान बचाई, बदले में मैंने चीनी मांओं और बच्चों की सेवा की.' 1980 में, शू यान अपने बच्चे के साथ शेनयांग लौट आई और एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करने लगी. उस नौकरी से रिटायर होने के बाद, उन्होंने खुद पारंपरिक चीनी चिकित्सा सीखी और अपने पड़ोसियों का इलाज करना शुरू कर दिया.

रिटायर होने के बाद ही उसे यह सच्चाई पता चली कि वह युद्ध के दौरान जापान में अनाथ हुए कई बच्चों में से एक है. उस समय के टीकाकरण के तरीकों में अंतर की वजह से यह पता लगाने में मदद मिली कि वह जापानी मूल की है. लेकिन, जब कई लोग अपने असली परिवार की तलाश में जापान लौट गए, तब भी शू यान ने चीन में ही रहने का फैसला किया. वह मानती है कि जिस चीन ने उसे पाला, वही उसका असली घर है. वह हमेशा वहां के लोगों की सेवा करने की कोशिश करती है. पहले एक दाई के रूप में और आज इलाज करके.