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Aja Ekadashi 2022: राजा हरिशचंद्र से जुड़ी है अजा एकादशी की कथा, इसे सुनने से भी मिलते हैं शुभ फल

Aja Ekadashi 2022: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं। इस बार ये एकादशी 23 अगस्त, मंगलवार को है। इस व्रत का विशेष महत्व धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस व्रत की कथा राजा हरिशचंद्र से जुड़ी है जो महान दानवीर थे।
 

Aja Ekadashi 2022 Story of Aja Ekadashi Worship method of Aja Ekadashi Auspicious timings of Aja Ekadashi MMA
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Ujjain, First Published Aug 23, 2022, 5:45 AM IST

उज्जैन. हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन के स्वामी भगवान विष्णु हैं। एकादशी पर व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा हम पर बनी रहती है। हर हिंदू महीने में 2 बार एकादशी तिथि आती है। इस तरह एक साल में कुल 24 एकादशी होती है। हर एकादशी का अपना अलग नाम और महत्व है। इस बार 23 अगस्त, मंगलवार को अजा एकादशी (Aja Ekadashi 2022) का व्रत किया जाएगा। इस व्रत की कथा राजा हरिशचंद्र से जुड़ी है जो भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। मान्यता है कि अजा एकादशी की कथा (Aja Ekadashi 2022 Katha) सुनने से भी अश्वमेध यज्ञ जितना फल मिलता है। जानिए कौन थे राजा हरिशचंद्र और उनकी पूरी कथा…

दानवीर थे राजा हरिशचंद्र
पौराणिक काल में भगवान श्रीराम के पूर्वज हरिशचंद्र अयोध्या में राज करते थे। वे अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार देवताओं ने उनकी परीक्षा लेनी की सोची। इसके लिए ऋषि विश्वामित्र को चुना गया। ऋषि विश्वामित्र राजा हरीशचंद्र की परीक्षा लेने के लिए उनके पास गए और उनका पूरा राज्य दान में मांग लिया। राजा हरिशचंद्र ने बिना संकोच किए उन्हें अपना पूरा राज्य सौंप दिया।

जब राजा ने स्वयं को बेचकर दी दक्षिणा
इसके बाद भी जब ऋषि विश्वामित्र की परीक्षा पूरी नहीं हुई तो उन्होंने दक्षिणा के  रूप में राजा हरिशचंद्र से 100 स्वर्ण मुद्राओं की मांग की। तब राजा हरीशचंद्र में स्वयं को अपनी पत्नी व पुत्र को बेचकर 100 स्वर्ग मुद्राएं ऋषि विश्वामित्र को दी। राजा हरिशचंद्र की पत्नी लोगों के घर का काम करने लगी और वे स्वयं एक चांडाल के दास बनकर श्मशान में रहने लगे। 

जब पत्नी से मांगा पुत्र के दाह संस्कार का धन
एक रात जब हरिशचंद्र श्मशान में सो रहे थे, तब एक महिला अपने मृत पुत्र को लेकर श्मशान में दाह संस्कार के लिए लाई। परंपरा के अनुसार, राजा हरिशचंद्र ने उस महिला से दाह संस्कार के लिए धन की मांग की। लेकिन महिला के पास कुछ भी नहीं था। बाद में हरिशचंद्र को पता चला कि ये महिला और कोई नहीं बल्कि उनकी पत्नी है और वो मृत बालक उनका पुत्र है।

जब देवता प्रसन्न हुए हरिशचंद्र पर
अपने मृत पुत्र और पत्नी की इस अवस्था को देखकर भी हरिशचंद्र ने अपनी सत्यनिष्ठा नहीं छोड़ी और बिना धन के अपने मृत पुत्र का अंतिम संस्कार करने से इंकार कर दिया। तब उनकी पत्नी ने अपने साड़ी का आधा हिस्सा फाड़कर उन्हें दिया। जब देवताओं ने ये देखा वे राजा हरिशचंद्र की सत्यवादिता और कर्तव्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर वहां आए। 

ऋषि विश्वामित्र ने लौटा दिया राज्य
ऋषि विश्वामित्र भी देवताओं के साथ राजा हरिशचंद्र के पास आए और उन्हें उनका राज्य पुन: लौटा दिया। मान्यता है कि ऋषि गौतम के कहने पर राजा हरिशचंद्र ने अजा एकादशी का व्रत किया था, जिसके चलते उन्हें अपने राज्य और वैभव पुन: प्राप्त हो गया। इसलिए अजा एकादशी को बहुत ही विशेष तिथि माना जाता है।


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