हिंदू धर्म में कई परंपराओं का पालन किया जाता है। इन परंपराओं के पीछे कहीं-न-कहीं कोई कारण जरूर छिपा होता है। ऐसी ही एक परंपरा है कि राम-राम बोलने की। पुरातन समय में जब भी दो लोग मिलते थे तो किसी न किसी भगवान का नाम लेकर एक-दूसरे का अभिवादन करते थे।

उज्जैन. अभिवादन के लिए सबसे ज्यादा भगवान राम का नाम लिया जाता था। ये परंपरा आज भी कायम है। लोग एक-दूसरे को “राम-राम” कहते हैं। अभिवादन तो सिर्फ एक बार राम बोलकर भी किया जा सकता है, लेकिन राम शब्द का उपयोग 2 बार ही क्यों किया जाता है। आज से ही नहीं बल्कि आदिकाल से यह शब्द बोला जा रहा है जिसके बारे में शायद ही किसी ने कभी सोचा होगा। इसके पीछे का कारण आज हम आपको बता रहे हैं। लेकिन उसके पहले जानते हैं राम शब्द का अर्थ…

राम शब्द का अर्थ
'रम्' धातु में 'घञ्' प्रत्यय के योग से 'राम' शब्द निष्पन्न होता है। 'रम्' धातु का अर्थ रमण (निवास, विहार) करने से सम्बद्ध है। वे प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास) करते हैं, इसलिए 'राम' हैं तथा भक्तजन उनमें 'रमण' करते (ध्याननिष्ठ होते) हैं, इसलिए भी वे 'राम' हैं - "रमते कणे कणे इति रामः"। कण-कण में जिनका वास है, वही राम हैं।

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2 बार क्यों बोलते हैं 
दरअसल दो बार "राम-राम" बोलने के पीछे बड़ा गूढ़ रहस्य है क्योंकि यह आदि काल से ही चला आ रहा है हिन्दी की शब्दावली में "र" सत्ताइस्वां शब्द है, "आ" की मात्रा दूसरा और "म" पच्चीसवां शब्द है। अब तीनो अंको का योग करें तो 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक “राम” का योग 54 हुआ। इसी प्रकार दो "राम-राम" का कुल योग 108 होगा। हम जब कोई जाप करते हैं तो 108 मनके की माला गिनकर करते हैं। सिर्फ "राम-राम" कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।

108 जाप का महत्व
इस संबंध में शास्त्रों में दिया गया है कि एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है।