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कार्तिक मास 1 नवंबर से, इस महीने में रोज करना चाहिए नदी स्नान, ये है विधि और महत्व

हमारे धर्म शास्त्रों में अशांति, पाप आदि से बचने के कई उपाय बताए गए हैं। उन्हीं में से कार्तिक मास में किया गया स्नान व व्रत भी एक है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, कलियुग में कार्तिक मास में किए गए व्रत, स्नान व तप को मोक्ष प्राप्ति का रास्ता बताया गया है।

Kartika Mass from 1st November, know the importance of bathing in river in this month KPI
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Ujjain, First Published Oct 30, 2020, 10:46 AM IST
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उज्जैन. हमारे धर्म शास्त्रों में अशांति, पाप आदि से बचने के कई उपाय बताए गए हैं। उन्हीं में से कार्तिक मास में किया गया स्नान व व्रत भी एक है। स्कंद पुराण आदि अनेक धर्म ग्रंथों में कार्तिक मास के स्नान व व्रत की महिमा बताई गई है। इस बार कार्तिक मास का प्रारंभ 1 नवंबर से हो रहा है, जो 30 नवंबर तक रहेगा।
कार्तिक में पूरे माह ब्रह्ममुहूर्त में किसी नदी, तालाब, नहर या पोखर में स्नान कर भगवान की पूजा किए जाने का विधान है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, कलियुग में कार्तिक मास में किए गए व्रत, स्नान व तप को मोक्ष प्राप्ति का रास्ता बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार-

न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।
अर्थात- कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।

इस विधि से करें कार्तिक मास में नदी स्नान...
स्कंदपुराण के अनुसार, कार्तिक महीने में किया गया स्नान व्रत भगवान विष्णु की पूजा के समान कहा गया है। कार्तिक मास में स्नान किस प्रकार किया जाए, इसका वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार लिखा है-

तिलामलकचूर्णेन गृही स्नानं समाचरेत्।
विधवास्त्रीयतीनां तु तुलसीमूलमृत्सया।।
सप्तमी दर्शनवमी द्वितीया दशमीषु च।
त्रयोदश्यां न च स्नायाद्धात्रीफलतिलैं सह।।

अर्थात- कार्तिक व्रती (व्रत रखने वाला) को सबसे पहले गंगा, विष्णु, शिव तथा सूर्य का स्मरण कर नदी, तालाब या पोखर के जल में प्रवेश करना चाहिए। उसके बाद नाभिपर्यन्त (आधा शरीर पानी में डूबा हो) जल में खड़े होकर स्नान करना चाहिए।

गृहस्थ व्यक्ति को काला तिल तथा आंवले का चूर्ण लगाकर स्नान करना चाहिए परंतु विधवा तथा संन्यासियों को तुलसी के पौधे की जड़ में लगी मृत्तिका (मिट्टी) को लगाकर स्नान करना चाहिए। सप्तमी, अमावस्या, नवमी, द्वितीया, दशमी व त्रयोदशी को तिल एवं आंवले का प्रयोग वर्जित है।

इसके बाद व्रती को जल से निकलकर शुद्ध वस्त्र धारणकर विधि-विधानपूर्वक भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। यह ध्यान रहे कि कार्तिक मास में स्नान व व्रत करने वाले को केवल नरक चतुर्दशी (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) को ही तेल लगाना चाहिए। शेष दिनों में तेल लगाना वर्जित है।

निरोगी बनाता है कार्तिक मास...
धर्म शास्त्रों में प्रत्येक ऋतु व मास का अपना विशेष महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में कार्तिक मास के बारे में लिखा है कि यह महीना स्नान, तप व व्रत के लिए सर्वोत्तम है। यह मास सिर्फ धार्मिक कार्यों के लिए ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी लाभदायक है। स्कंदपुराण के वैष्णव खंड में कार्तिक मास के महत्व के विषय में कहा गया है-

रोगापहं पातकनाशकृत्परं सद्बुद्धिदं पुत्रधनादिसाधकम्।
मुक्तेर्निदांन नहि कार्तिकव्रताद् विष्णुप्रियादन्यदिहास्ति भूतले।।
(स्कंदपुराण. वै. का. मा. 5/34)

अर्थात- कार्तिक मास आरोग्य प्रदान करने वाला, रोगविनाशक, सद्बुद्धि प्रदान करने वाला तथा मां लक्ष्मी की साधना के लिए सर्वोत्तम है।

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