हिंदू धर्म में हर पर्व व व्रत के साथ कई परंपराएं देखने को मिलती हैं। करवा चौथ पर छलनी से चंद्रमा व पति को देखना और करवे से पानी पीकर अपना व्रत पूर्ण करना भी एक परंपरा है, इसके पीछे भी मनोवैज्ञानिक पक्ष ही निहित है।

उज्जैन. हिंदू धर्म में हर पर्व व व्रत के साथ कई परंपराएं देखने को मिलती हैं। इनमें से कुछ परंपराओं का वैज्ञानिक पक्ष होता है, कुछ का धार्मिक तो कई परंपराओं का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी होता है। करवा चौथ पर छलनी से चंद्रमा व पति को देखना और करवे से पानी पीकर अपना व्रत पूर्ण करना भी एक परंपरा है, इसके पीछे भी मनोवैज्ञानिक पक्ष ही निहित है, जो इस प्रकार है-

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इसलिए पत्नी छलनी से देखती हैं पति को
करवा चौथ का पूजन करते समय सर्वप्रथम विवाहित महिलाएं छलनी से चंद्रमा को देखती हैं व बाद में अपने पति को। ऐसा करने के पीछे कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं होता बल्कि पत्नी के ह्रदय की भावना होती है। पत्नी जब छलनी से अपने पति को देखती है तो उसका मनोवैज्ञानिक अभिप्राय यह होता है कि मैंने अपने ह्रदय के सभी विचारों व भावनाओं को छलनी में छानकर शुद्ध कर लिया है, जिससे मेरे मन के सभी दोष दूर हो चुके हैं और अब मेरे ह्रदय में पूर्ण रूप से आपके प्रति सच्चा प्रेम ही शेष है। यही प्रेम में आपको समर्पित करती हूं और अपना व्रत पूर्ण करती हूं।

इसलिए करवे से पीती हैं पानी
मिट्टी का करवा पंच तत्व का प्रतीक है, मिट्टी को पानी में गला कर बनाते हैं जो भूमि तत्व और जल तत्व का प्रतीक है, उसे बनाकर धूप और हवा से सुखाया जाता है जो आकाश तत्व और वायु तत्व के प्रतीक हैं फिर आग में तपाकर बनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पानी को ही परब्रह्म माना गया है, क्योंकि जल ही सब जीवों की उत्पत्ति का केंद्र है। इस तरह मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर पति पत्नी अपने रिश्ते में पंच तत्व और परमात्मा दोनों को साक्षी बनाकर अपने दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने की कामना करते हैं।