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Teja Dashmi 16 सितंबर को, ग्रामीण क्षेत्रों में धूम-धाम से मनाया जाता है ये पर्व, भक्त चढ़ाते हैं छतरियां

16 सितंबर, गुरुवार, को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है। इस तिथि पर तेजा दशमी (Teja Dashmi 2021) मनाई जाती है। इस दिन तेजा जी महाराज के मंदिरों में मेला लगता है और भक्त तेजा जी को रंग-बिरंगी छतरियां चढ़ाते हैं।

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Ujjain, First Published Sep 15, 2021, 10:32 AM IST
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उज्जैन. तेजादशमी का पर्व ग्रामीण क्षेत्रों में धूमधाम से मनाया जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में काफी लोगों की मृत्यु सांप के काटने से हो जाती है। मान्यता है कि जो लोग तेजा जी महाराज की पूजा करते हैं, उन्हें सर्प दंश का भय नहीं रहता है।

ये है तेजाजी महाराज (Teja Dashmi 2021) की कथा
- प्रचलित कथा के अनुसार तेजा जी बचपन से ही वीर थे और साहसिक काम करने से डरते नहीं थे। एक बार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर वे अपनी बहन को लेने के लिए उसके ससुराल गए।
- वहां उन्हें मालूम हुआ कि एक डाकू बहन की ससुराल से सारी गायें लूटकर ले गया है। तेजा जी जंगल में डाकू को खोजने के लिए निकल गए। रास्ते में भाषक नाम का एक सांप घोड़े के सामने आ जाता है और तेजा जी को डंसने लगता है।
- तेजा जी सांप से न डंसने की प्रार्थना करते हैं और वचन देते हैं कि बहन की गायों को छुड़ाने के बाद मैं वापस यहां आ जाऊंगा, तब मुझे डंस लेना। ये बात सुनकर सांप रास्ता छोड़ देता है। तेजा जी डाकू से बहन की गायों को छुड़वा कर उसके घर पहुंचा देते हैं।
- डाकूओं से लड़ाई करते हुए वे घायल हो चुके थे। उनके शरीर के कई हिस्सों से खून बह रहा था। ऐसी ही हालत में वे सांप के पास अपना वचन निभाने पहुंच जाते हैं। तेजा जी को घायल अवस्था में देखकर नाग कहता है कि तुम्हारा पूरा शरीर खून से अपवित्र हो गया है। मैं डंक कहां मारुं? तब तेजा जी उसे अपनी जीभ पर काटने के लिए कहते हैं।
- तेजा जी की वचन पालना देखकर नागदेव उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि जो व्यक्ति सर्पदंश से पीड़ित है, अगर वह तुम्हारे नाम का धागा बांधेगा तो उस पर जहर का असर नहीं होगा। उसके बाद नाग तेजा जी की जीभ पर डंक मार देता है।
- इसके बाद से हर साल भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजा जी महाराज के मंदिरों में श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। जिन लोगों ने सर्पदंश से बचने के लिए तेजाजी के नाम का धागा बांधा होता है, वे मंदिर में पहुंचकर धागा खोलते हैं और विशेष पूजा अर्चना करते हैं।

 

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