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भगवान शिव के इस अवतार ने काटा था ब्रहमा का पांचवा सिर, यहां मिली थी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति

शिवपुराण के अनुसार, भैरव भी भगवान शंकर के ही अवतार हैं। भैरव के बारे में प्रचलित है कि ये अति क्रोधी, तामसिक गुणों वाले तथा मदिरा के सेवन करने वाले हैं।

This incarnation of Lord Shiva had cut off the fifth head of Brahma, here he was liberated for this sin KPI
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Ujjain, First Published Jul 12, 2020, 11:05 AM IST
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उज्जैन. शिव के भैरव अवतार का मूल उद्देश्य है कि मनुष्य अपने सारे अवगुण जैसे- मदिरापान, तामसिक भोजन, क्रोधी स्वभाव आदि भैरव को समर्पित कर पूर्णत: धर्ममय आचरण करें।

काशी के अधिपति हैं भैरव
शिवपुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इसके अवतार की कथा इस प्रकार है-
एक बार भगवान शंकर की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे। इस विषय में जब वेदों से पूछा गया तब उन्होंने शिव को सर्वश्रेष्ठ एवं परमतत्व कहा। किंतु ब्रह्मा व विष्णु ने उनकी बात का खंडन कर दिया। तभी वहां तेजपुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखलाई पड़ी। उन्हें देखकर ब्रह्माजी ने कहा- चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो। अत: मेरी शरण में आओ। ब्रह्मा की ऐसी बात सुनकर भगवान शंकर को क्रोध आ गया।
उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। आप से काल भी भयभीत रहेगा, अत: आप कालभैरव हैं। मुक्तिपुरी काशी का आधिपत्य आपको सर्वदा प्राप्त रहेगा। उक्त नगरी के पापियों के शासक भी आप ही होंगे। भगवान शंकर से इन वरों को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा का पांचवां मस्तक काट दिया। ब्रह्मा का पांचवां मस्तक काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए।

भैरव पर लगा ब्रह्महत्या का दोष
ब्रह्मा का पांचवां सिर काटने के कारण भैरव ब्रह्महत्या के पाप से दोषी हो गए। तभी वहां ब्रह्महत्या उत्पन्न हुई और भैरव को त्रास देने लगी। तब भगवान शिव ने ब्रह्महत्या से मुक्ति के लिए भैरव को व्रत करने का आदेश दिया व कहा- जब तक यह कन्या (ब्रह्महत्या) वाराणसी पहुंचे, तब भयंकर रूप धारण करके तुम इसके आगे ही आगे चले जाना।
वाराणसी में ही तुम्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी। सर्वत्र विचरण करते हुए जब भगवान भैरव ने विमुक्त नगरी वाराणसी पुरी में प्रवेश किया, उसी समय ब्रह्महत्या पाताल में चली गई और भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई।

शिव के साथ करें भैरव की भक्ति
जो प्राणी काशी में स्थित कपाल मोचन तीर्थ का स्मरण करता है, उसके इस जन्म एवं दूसरे सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां आकर सविधि स्नानपूर्वक पितरों एवं देवताओं का तर्पण करके मानव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है। कपाल मोचन तीर्थ के समीप ही भक्तों के सुखदायक भगवान भैरव स्थित हैं। सज्जनों के प्रिय भैरव का प्रादुर्भाव मार्गशीर्ष की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। उसी दिन को उपवासपूर्वक जो प्राणी कालभैरव के समीप जागरण करता है, वह संपूर्ण महापापों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
यदि कोई व्यक्ति भगवान विश्वेश्वर का भक्त होते हुए भी कालभैरव का भक्त नहीं है, तो उसे बड़े-बड़े दु:ख भोगने पड़ते हैं। यह बात काशी में विशेष रूप से चरितार्थ होती है। काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है। भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में भैरव अवतार को पांचवां बताया गया है। इनकी शक्ति का नाम है भैरवी। भैरवी को गिरिजा का अवतार भी माना गया है।

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