युद्ध में धृतराष्ट्र का सिर्फ 1 पुत्र बचा था जीवित, पांडवों ने क्यों नहीं मारा उसे…कारण जान आप चौंक जाएंगे

Published : Dec 20, 2021, 02:50 PM ISTUpdated : Dec 20, 2021, 03:05 PM IST
युद्ध में धृतराष्ट्र का सिर्फ 1 पुत्र बचा था जीवित, पांडवों ने क्यों नहीं मारा उसे…कारण जान आप चौंक जाएंगे

सार

Mahabharat: महाभारत की कथा जितनी पुरातन है, उतनी ही रोचक भी हैं। इसमें कई ऐसे पात्र भी हैं, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। आमतौर पर लोग धृतराष्ट्र और गांधारी के दुर्योधन आदि सौ पुत्रों के बारे में ही बात की जाती है। लेकिन, धृतराष्ट्र का एक पुत्र और था। उसकी माता गांधारी नहीं थीं। वह एक दासी का पुत्र था।

उज्जैन. युद्ध के बाद धृतराष्ट्र का जो एक मात्र पुत्र जीवित बचा, उसका नाम युयुत्सु (Yuyutsu) था। महाभारत के अनुसार जब गांधारी गर्भवती थीं, तब धृतराष्ट्र की देखभाल एक वैश्य दासी करती थी। उसी दासी से ही युयुत्सु का जन्म हुआ था। धृतराष्ट्र (Dhritarashtra) का पुत्र होने की वजह से युयुत्सु भी कौरव ही कहलाया। लेकिन, वह दुर्योधन (Duryodhana) और दुशासन की तरह अधर्मी नहीं था। वह धर्म का जानकार था। आगे जानिए युयुत्सु से जुड़ी खास बातें…

युद्ध में दिया था पांडवों का साथ
युद्ध शुरू होने से पहले युधिष्ठिर (Yudhishthira) ने रणभूमि के बीच खड़े होकर कौरव सेना के सैनिकों से पूछा था, क्या शत्रु सेना का कोई भी वीर पांडवों के पक्ष से युद्ध करना चाहता है। तब युयुत्सु ने कौरवों की सेना को छोड़ दिया था और पांडव पक्ष में आ गया था। युयुत्सु के ऐसा करने पर दुर्योधन ने बहुत भला-बुरा कहा था और अपमानित भी किया था। 

धृतराष्ट्र का यही पुत्र बचा था युद्ध में
दुर्योधन और अन्य कौरव महायोद्धाओं की मृत्यु के बाद पांडव युद्ध जीत गए थे। युद्ध के बाद सिर्फ युयुत्सु एकमात्र कौरव जीवित बचा था। युयुत्सु एक नैतिक योद्धा था, जिसने उन परिस्थितियों में पैदा होने के बावजूद, बुराई का साथ न देकर धार्मिकता का मार्ग चुना। उन्होंने धर्म का साथ देने के लिए अपने पारिवारिक बंधनों को त्याग दिया।

युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने सौंपा था ये काम
महाभारत के अनुसार, कुरुक्षेत्र में हुए भयंकर युद्ध में धृतराष्ट्र के सभी पुत्र मारे गए तब सिर्फ युयुत्सु ही शेष बचा था क्योंकि उसने पांडवों का साथ दिया था। जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने तो उन्होंने सभी भाइयों को अलग-अलग काम सौंपे। तब युयुत्सु को उन्होंने अपने पिता धृतराष्ट्र की सेवा के लिए नियुक्त किया था। जब पाडंव स्वर्ग की यात्रा पर निकले तो उन्होंने परीक्षित को राजा बनाया और युयुत्सु को उसका संरक्षक नियुक्त किया।

 

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