करौली : चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri 2022) देशभर में मनाई जा रही है। इस बीच राजस्थान (Rajasthan) के मंदिरों में भी माता भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है। पूर्वी राजस्थान की मुख्य आराध्या करौली (karauli) की कैलादेवी (Kailadevi) को वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान योगमाया का रूप माना जाता है। लाखों लोगों की आस्था का केंद्र कैला देवी के इस मंदिर में ना केवल आम श्रद्धालु पहुंचते हैं बल्कि चंबल बीहड़ों के डकैत भी यहां पूजा करने पहुंचते हैं। कैलादेवी मां की मान्यता और लोगों के दिलों में इनकी गहरी आस्था है। इसीलिए हर वर्ष यहां पर चैत्र मास में विशाल मेला भी लगता है। तस्वीरों में देखिए माता कैलादेवी का धाम...
ये है इतिहास
कैलादेवी का मंदिर राजस्थान के करौली जिले का प्राचीन मंदिर है। मंदिर में दो मूर्तियां स्थापित हैं, जिनमें से एक मूर्ति कैला देवी की और दूसरी चामुंडा मैया की है। ये दोनों मूर्तियां चांदी की चौकी पर स्वर्ण छतरियों के नीचे विराजित हैं। उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में प्रख्यात इस मंदिर की स्थापना 1600 ई में राजा भोमपाल ने की थी।
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भगवान श्रीकृष्ण की बहन
कैलादेवी को भगवान श्रीकृष्ण की बहन माना जाता है। कहा जाता है कि जब वासुदेव और देवकी कंस की कैद में थे, तो उनकी आठवीं संतान ने कन्या के रूप में जन्म लिया। आध्यात्मिक ग्रंथों में बताया जाता है कि यह आठवीं संतान योगमाया का रूप था और जैसे ही कंस ने उसे मारने का प्रयास किया तो वो अंतर्ध्यान हो गई। वासुदेव और देवकी की वही आठवीं संतान कन्या करौली में कैला देवी के रूप में विराजमान है।
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बीहड़ के डकैत भी आते हैं पूजा करने
कैला देवी मां के मंदिर में डकैतों की पूजा के भी क्षेत्र में खासे चर्चे रहते हैं। बताया जाता है कि चंबल के बीहड़ों से निकलकर डकैत वेश बदलकर मंदिर में पूजा करने आते हैं। जब डकैतों की मन्नत पूरी हो जाती है तो वह मंदिर में विजय घंट भी चढ़ाते हैं। कई डकैतों को पकड़ने के लिए पुलिस भी मंदिर पर हमेशा नजर बनाए रखती है। लेकिन माना जाता है कि जो डकैत यहां पर पूजा करने आते हैं, उनमें से अधिकतर डकैतों को पुलिस पूजा के दौरान पकड़ नहीं पाई।
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शादी के बाद दर्शन की भी मान्यता
मंदिर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि बाबा केदारगिरी ने कठोर तपस्या कर माता के श्रीमुख की स्थापना की थी। मंदिर में लोग अपने बच्चों का पहली बार मुंडन करवाने के लिए पहुंचते है। लोगों का कहना है कि ऐसा करने से माता का आशीर्वाद उनके बच्चे को मलता है। उसका जीवन खुशियो से भर जाता है। मान्यता यह भी है कि परिवार में किसी का विवाह होने के बाद नवविवाहित जोड़ा जब तक कैला देवी के दर्शन नहीं करता तब तक परिवार को कोई सदस्य यहां नहीं आता।
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हर साल मेले का आयोजन
चैत्र के महीने में यहां वार्षिक मेला लगता है। जिसमें यूपी, एमपी समेत कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां कनक-दंडोतिस के रिवाज श्रद्धालु अपनाते हैं। मंदिर पहुंचने के लिए वे 15 से 20 किलोमीटर तक चलते हैं। कई तो लेटकर या दंडवत होकर माता के धाम तक पहुंचते हैं। यहां के कालीसिल नदी के चमत्कार भी कामी प्रसिद्ध है। मान्यता है यहां आने वालों के लिए कालीसिल नदी में स्नान करने से उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
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