
Puri Jagannath Temple History: भगवान जगन्नाथ का स्वरूप सबसे अलग है। उनकी मूर्ति में हाथ-पैर पूरी तरह नहीं बने हैं। इसलिए पहली बार दर्शन करने वाले लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी क्यों है? इसके पीछे राजा इंद्रद्युम्न और देवशिल्पी विश्वकर्मा से जुड़ी एक कथा सुनने को मिलती है।
मान्यताओं के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उन्होंने नीलमाधव (भगवान विष्णु के एक विराट स्वरूप) के बारे में सुना और उनके दर्शन करने की इच्छा जताई। काफी खोजबीन के बाद भी नीलमाधव के दर्शन ना हो सके। तब राजा ने कठोर तप किया। भक्ति से खुश होकर भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए। भगवान ने कहा- समुद्र तट पर मिलने वाले दिव्य दारु (पवित्र लकड़ी) से उनकी मूर्ति बनाकर स्थापना की जाए।
कुछ समय बाद पुरी के समुद्र तट पर एक विशाल दिव्य लकड़ी का लट्ठा बहकर आया। इसे दारु ब्रह्म कहा गया। मान्यता है इसी पवित्र लकड़ी में भगवान का दिव्य स्वरूप विराजमान था। राजा इंद्रद्युम्न ने उस लकड़ी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्ती बनवाने का संकल्प लिया।
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कथा के अनुसार, तभी एक बुजुर्ग बढ़ई राजा के पास आया। वह स्वयं देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा थे। उन्होंने राजा से कहा- मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी उन्हें दी जाए, लेकिन एक शर्त रखी। शर्त है थी- उन्हें एक कमरे में बंद करके लगातार 21 दिन तक काम करने दिया जाए। इस दौरान कोई भी दरवाजा नहीं खोलेगा, कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा। अगर बीच में किसी ने दरवाजा खोला, तो काम अधूरा छोड़ देंगे। राजा ने यह शर्त मान ली।
कई दिनों तक कमरे के अंदर से लकड़ी तराशने की आवाजें आती रहीं। कुछ समय बाद अंदर से आवाज आनी बंद हो गई। रानी गुंडिचा (गुंडीचा) परेशान हो गईं। उन्होंने सोचा कहीं बुजुर्ग बढ़ई के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। उन्होंने राजा से दरवाजा खोलने का निवेदन किया। शुरुआत में राजा ने मना किया, लेकिन रानी की जायज चिंता को देखते हुए उन्होंने 21 दिन से पहले ही दरवाजा खुलवा दिया।
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जैसे ही दरवाजा खोला गया, वह रहस्यमयी बढ़ई वहां से गायब हो गया। कमरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मौजूद थीं, लेकिन उनके हाथ और पैर पूरी तरह नहीं बने थे। राजा इंद्रद्युम्न को अपनी गलती का पछतावा हुआ। तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान यही चाहते हैं। इन्हीं मूर्तियों की पूजा हो। तब से आज तक पुरी में भगवान जगन्नाथ का यही स्वरूप पूजनीय है।
इतिहासकार बताते हैं जगन्नाथ का स्वरूप ओडिशा की प्राचीन जनजातीय (Tribal) पूजा परंपराओं से भी जुड़ा हो सकता है, जहां लकड़ी की सिंपल और प्रतीकात्मक मूर्तियों की पूजा की जाती थी।
भगवान जगन्नाथ का अधूरा दिखाई देने वाला स्वरूप कई मैसेज देता है। जिसमें-
पुरी के जगन्नाथ मंदिर में लगभग 12 से 19 साल के अंतर पर नवकलेवर की परंपरा निभाई जाती है। इसमें खास नीम (दारु) की लकड़ी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई मूर्तियां बनती हैं। नई मूर्तियां भी उसी पारंपरिक स्वरूप में बनाई जाती हैं, जिनमें हाथ-पैर पूरी तरह से डेवलप नहीं होते। सदियों पुरानी परंपरा आज भी जिंदा है।
कॉन्टेन्ट सोर्सः स्कंद पुराण (उत्कल खंड), ब्रह्म पुराण, नारद पुराण, श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन पुरी, ओडिशा रिव्यू (Odisha Review, Government of Odisha), जगन्नाथ परंपरा पर बेस्ड।