Jagannath Rath Yatra: पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा में गजपति महाराज झाड़ू क्यों लगाते हैं? जानिए 'छेरा पहंरा' परंपरा का इतिहास, धार्मिक महत्व और इसका मैसेज...
What is Chhera Pahanra: पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा में एक ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जो देश के किसी और बड़े धार्मिक कार्यक्रम में नहीं दिखता। ओडिशा के गजपति महाराज (पुरी के पारंपरिक राजा) भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों के सामने सोने के हत्थे वाली झाड़ू से साफ-सफाई करते हैं। इस परंपरा को 'छेरा पहंरा' (Chhera Pahanra) कहा जाता है। यह सिर्फ सफाई की रस्म नहीं है, इसके पीछे धार्मिक और सोशल मैसेज है। आइए जानते हैं यह अनोखी परंपरा क्या है और राजा ऐसा क्यों करते हैं...
क्या है 'छेरा पहंरा'?
'छेरा' का अर्थ है झाड़ू लगाना और 'पहंरा' का अर्थ है सेवा करना। रथयात्रा शुरू होने से पहले गजपति महाराज तीनों रथों पर चढ़ते हैं। इसके बाद वे सोने के हत्थे वाली खास झाड़ू से रथ के फर्श को साफ करते हैं। सुगंधित जल तथा चंदन मिक्स पानी का छिड़काव भी करते हैं। यह रस्म सदियों से चली आ रही है।
रथयात्रा में राजा झाड़ू क्यों लगाते हैं?
मान्यता है, भगवान जगन्नाथ ही इस सृष्टि के असली राजा हैं। पृथ्वी का कोई भी राजा उनके सामने खुद को सिर्फ सेवक मानता है। इसी भाव को दिखाने के लिए गजपति महाराज झाड़ू लगाते हैं। इसका मैसेज है कि भगवान के सामने सभी समान हैं। चाहे कोई राजा हो, मंत्री हो या आम इंसान, ईश्वर के दरबार में सबसे बड़ा सम्मान सेवा का है।
'छेरा पहंरा' परंपरा कब से चली आ रही है?
यह परंपरा कई सौ साल पुरानी है। गजपति राजाओं के समय से लगातार इसे निभाया जा रहा है। पुरी के गजपति महाराज को श्री जगन्नाथ मंदिर की पारंपरिक सेवाओं में विशेष स्थान मिला है। आज भी यह परंपरा बिना किसी बदलाव के होती है।
'छेरा पहंरा' परंपरा में सोने की झाड़ू का क्या महत्व है?
कई लोग सोचते हैं कि जब राजा झाड़ू लगाते हैं, तो साधारण झाड़ू का उपयोग होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। इस रस्म में सोने के हत्थे (Golden Handle) वाली खास झाड़ू का इस्तेमाल होता है। सोना यहां शाही सम्मान और भगवान के प्रति सर्वोच्च आदर का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, इस रस्म का सबसे बड़ा महत्व झाड़ू का सोने का होना नहीं, बल्कि राजा द्वारा सेवा करना है।
छेरा पहंरा का क्या है आम लोगों के लिए मैसेज?
छेरा पहंरा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को लेकर कई बड़े मैसेज भी देती है। जैसे- सेवा सबसे बड़ा धर्म है। पद-पोस्ट और पावर स्थायी नहीं हैं। भगवान के सामने सभी बराबर हैं। नेतृत्व का मतलब सिर्फ शासन करना नहीं, बल्कि सेवा करना भी है।
क्या सिर्फ पुरी में ही होती है छेरा पहंरा परंपरा?
छेरा पहंरा की परंपरा पुरी की रथयात्रा में ही निभाई जाती है। हालांकि, देश और विदेश में जहां-जहां जगन्नाथ रथयात्रा आयोजित होती है, वहां कई स्थानों पर इसी भावना से प्रतीकात्मक रूप में लोग सेवा करते हैं।
छेरा पहंरा की परंपरा से जुड़ी एक रोचक कहानी
रथयात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु गजपति महाराज को झाड़ू लगाते देखते हैं। यह ऐसा दुर्लभ मौका होता है, जब एक राजा खुद सार्वजनिक तौर पर भगवान का सेवक बनकर सेवा करता है। यह सीन जगन्नाथ रथयात्रा को दुनिया के सबसे अनोखे धार्मिक आयोजनों में शामिल करता है।
कॉन्टेन्ट सोर्स: Shree Jagannath Temple Administration (SJTA), Puri), Odisha Tourism, Skanda Purana (Purushottama Mahatmya), Ministry of Culture, Government of India.


