
हेल्थ डेस्क। कोरोना वायरस से दुनिया के ज्यादातर देश बेहाल हैं। इससे करीब 200 देशों के 18 लाख से भी ज्यादा लोग संक्रमित है, वहीं 1.4 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। इसके इलाज के वैक्सीन बनाने की कोशिश में दुनिया भर के हेल्थ साइंटिस्ट लगे हुए हैं। इसी बीच, पता चला है कि संक्रमित होकर ठीक हो चुके लोगों के प्लाज्मा का ट्रांसफ्यूजन करने से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। इस प्लाज्मा में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी डेवलप हो जाती है। अमेरिका के ह्यूस्टन में सेंट ल्यूक मेडिकल सेंटर में कोरोना वायरस से इन्फेक्टेड तीन भारतीय अमेरिकी मरीजों आईटी प्रोफेशनल रोहन बावडेकर, डॉ. लवंगा वेलुस्वामी और सुषम सिंह का इलाज किया जा रहा है। उन्हें हाल ही में प्लाज्मा ट्रांसफ्यूजन किया गया, जिसके बाद उनकी हालत में सुधार दिखा। अस्पताल के सूत्रों ने कहा कि प्लाज्मा ट्रांसफ्यूजन का उन पर बेहतर असर हुआ है। इससे यह उम्मीद जगी है कि कोरोना वायरस से पीड़ित लोगों के इलाज में यह तरीका कारगर हो सकता है।
लगेगा अभी समय
ह्यूस्टन कॉलेज ऑफ मेडिसिन में हेल्थ रिसर्चर लोला एडेपोजु ने कहा कि कोरोना के मरीजों के लिए वैक्सीन बनाने में करीब साल भर से डेढ़ साल का समय लग सकता है और इतना लंबा इंतजार कर पाना संभव नहीं है। अस्पताल के सूत्रों ने कहा कि तीन भारतीय अमेरिकी, जो कोरोना संक्रमण के बाद गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हुए थे, प्लाज्मा ट्रांसफ्यूजन होने के बाद तेजी से ठीक हो रहे हैं। कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन कोई नहीं है और नए मामले रोज ही बढ़ रहे हैं, इसलिए टेक्सास और देश भर के डॉक्टर इसके इलाज के लिए पुरानी तकनीक पर आधारित प्लाज्मा ट्रांसफ्यूजन का एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं, लेकिन अभी यह तय नहीं है कि यह पूरी तरह से कितना असरदार हो पाएगा।
क्या है इलाज का तरीका
इलाज के इस तरीके में उन लोगों से एंटीबॉडी वाला प्लाज्मा लिया जाता है, जो कोरोना वायरस के शिकार हो चुके हैं। इसमें कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी विकसित हो जाती है। वैक्सीन नहीं होने की स्थिति में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को यह तकनीक इलाज के लिए ठीक लग रही है। उनका कहना है कि इसमें जोखिम कम है और पहले भी महामारी के दौरान यह तरीका इलाज में असरदार रहा है।
फूड एंड ड्र्ग एडमिनिस्ट्रेशन से नहीं मिली है स्वीकृति
फिलहाल, अमेरिका के फूड एंड ड्र्ग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से इसे स्वीकृति नहीं मिली है, लेकिन ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने शुरुआती परीक्षणों के लिए अनुमति दे दी है। एक शोधकर्ता का कहना है कि जब तक कोरोना वायरस को खत्म करने के लिए कोई वैक्सीन सामने नहीं आता है, तब तक प्लाज्मा से इसका ट्रीटमेंट करने में कोई बुराई नहीं है, अगर इससे मरीजों में ठीक होने के लक्षण दिख रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि वे बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल किए जाने की अनुमति देने के एफडीए से अनुरोध करेंगे।
ऑस्टिन में भी शुरू हुआ इस तरीके से इलाज
टेक्सास के ऑस्टिन में भी इस तरीके से कोरोना के मरीजों का इलाज किया जा रहा है और उनमें भी सुधार देखा गया है। गुरुवार को ऑस्टिन में कोरोना के एक मरीज को प्लाज्मा का ट्रांसफ्यूजन किया गया। हेमटोलॉजिस्ट और टेक्सास ऑन्कोलॉजी के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. जेफ योरियो ने कहा कि इससे मरीज की हालत में सुधार दिखा। उन्होंने कहा कि अभी इस तरह के उपचार की सफलता के बारे में अभी ठीक से कुछ नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि हम यह नहीं जानते कि यह कितना प्रभावी हो सकता है। लेकिन योरियो ने यह भी कहा कि ऑस्टिन में COVID-19 के गंभीर या जानलेवा मामलों वाले कम से कम 5 दूसरे रोगियों की पहचान की है, जिनका इलाज डॉक्टर प्लाज्मा से करना चाहते हैं। एफडीए ने अनुरोध प्राप्त करने के कुछ समय के बाद रोगियों के इलाज की मंजूरी दे दी है।
पहली बार नहीं हो रहा ऐसा
इस तकनीक का इस्तेमाल पहले भी किया जा चुका है। डॉक्टर योरियो ने कहा कि अभी हम पहले सबसे बीमार मरीजों की पहचान कर रहे हैं। प्लाज्मा ऑस्टिन के ब्लड बैंक वी. आर. ब्लड से आया है। यह प्लाज्मा कोरोना से संक्रमित रहे, लेकिन ठीक हो चुके 20 से अधिक डोनर से मिला है। वी. आर. ब्लड के प्रवक्ता निक कैनेडो ने कहा कि लैब टेस्ट में कोविड -19 एंटीबॉडी के लिए पॉजिटिव पाए जाने के बाद ही प्लाज्मा लिया जाता है। कैनेडो का कहना है कि कोई व्यक्ति जो शुरू में जांच में कोरोना पॉजिटिव पाया जाता है और दूसरी बार जांच में 14 दिनों तक उसमें कोरोना के लक्षणों नहीं पाए जाते, वही प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। प्लाज्मा डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप एक ही होना चाहिए। यह पहली बार नहीं है जब वैक्सीन विकसित होने से पहले डॉक्टरों ने संक्रामक रोगों से निपटने के लिए प्लाज्मा का उपयोग किया है। हेल्थ साइंटिस्ट एडेपोजू ने कहा कि इस तकनीक का उपयोग 1979 में हेमरेज फीवर और 1918 में स्पेनिश इन्फ्लूएंजा के इलाज के लिए किया गया था और इससे दोनों महामारियों में मृत्यु दर को कम करने में मदद मिली थी।
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