Study : देश में बढ़ रही है मानसिक रोगियों की संख्या, हर 7 में एक व्यक्ति है मानसिक रूप से अस्वस्थ

Published : Dec 25, 2019, 10:16 AM ISTUpdated : Dec 25, 2019, 10:23 AM IST
Study : देश में बढ़ रही है मानसिक रोगियों की संख्या,  हर 7 में एक व्यक्ति है मानसिक रूप से अस्वस्थ

सार

देश में मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा की गई एक स्टडी से यह जानकारी सामने आई है। 

हेल्थ डेस्क। देश में मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा की गई एक स्टडी से यह जानकारी सामने आई है। मानसिक बीमारियों का जल्दी पता नहीं चल पाता। इसलिए इसे एक साइलेंट किलर भी कहते हैं। मानसिक बीमारियों को लेकर समाज में जो गलत धारणाएं फैली हुई हैं, इसके चलते लोग इन बीमारियों से पीड़ित होने के बावजूद इलाज करने से कतराते हैं। 

इंडियन मेडिकल काउंसिल द्वारा की गई एक स्टडी से पता चला है कि देश में 1990 से 2017 के बीच मानसिक रोगियों की संख्या दोगुनी हो गई है। 2017 में पूरे देश में 197 मिलियन लोग मानसिक बीमारियों के शिकार पाए गए, जिनमें 46 मिलियन डिप्रेशन के शिकार थे और 45 मिलियन एंग्जायटी जैसी समस्या से पीड़ित थे। स्टडी से पता चला है कि हर 7 लोगों में एक किसी न किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहा है। इन मानसिक बीमारियों में डिप्रेशन, एंग्जाइटी, स्कीजोफ्रेनिया, बायपोलर डिसऑर्डर और ऑटिज्म हैं। 

नई दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस के प्रोफेसर राजेश सागर ने कहा कि मानसिक बीमारियां बहुत बड़ा बोझ बनती जा रही हैं, जिन पर किसी का खास ध्यान नहीं है। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि तत्काल मानसिक चिकित्सा संबंधी सुविधाएं बढ़ाई जाएं और मानसिक बीमारियों को लेकर लोगों में जो गलत धारणाएं हैं, उन्हें दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए। 

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के भारत में प्रतिनिधि डॉक्टर हेन्ड्रिक जे. बेकेडाम ने कहा कि सरकार मेंटल हेल्थ की चुनौती से जूझने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। उनका कहना था कि आयुष्मान भारत योजना के जरिए भी मानसिक बीमारियों की चुनौती से निपटा जा सकता है। इसके तहत हेल्थ और वेलनेस सेंटर खोले जा सकते हैं और वहां बीमारियों की पहचान के साथ उन्हें रोकने की योजनाओं पर काम किया जा सकता है। साथ ही, जो लोग मानसिक बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें भी उचित इलाज मुहैया कराया जा सकता है। 

स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादा उम्र के लोगों के बीच डिप्रेशन की समस्या का बढ़ना चिंता की बात है। आत्महत्या की बढ़ती दर से भी इस समस्या का संबंध है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्टडी से जुड़े तमाम चिकित्सा वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का कहना था कि इस समस्या को दूर करने के लिए तत्काल उपाय करने होंगे और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। अगर जल्दी ऐसा नहीं किया जाता है तो इसका बहुत बुरा असर होगा। मानसिक बीमारियां शारीरिक बीमारियों की तुलना में ज्यादा गंभीर होती हैं। 

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