
PM Modi BRICS Challenge: 18वें BRICS Summit की अध्यक्षता करते हुए भारत के सामने इस बार कूटनीतिक संतुलन की कठिन परीक्षा है। एक तरफ अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी है, तो दूसरी ओर रूस और चीन हैं, जो वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की पैरवी करते रहे हैं। ईरान भी BRICS का हिस्सा है, जबकि उसका अमेरिका से टकराव सऊदी अरब और UAE तक असर डाल रहा है। सितंबर 2023 में भारत ने G20 Summit के दौरान यूक्रेन युद्ध के बीच रूस और पश्चिमी देशों को एक साझा घोषणापत्र पर सहमत कराकर अपनी कूटनीतिक क्षमता दिखाई थी। अब BRICS में चुनौती और पेचीदा है। भारत मंडपम में 11 सदस्य देशों के नेता जुटेंगे, जिनमें चीन के शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हैं। ईरान, सऊदी अरब और UAE की मौजूदगी इस बैठक को और संवेदनशील बनाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप BRICS को अमेरिकी आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए चुनौती मानते रहे हैं। उन्होंने BRICS देशों को डॉलर के विकल्प के तौर पर नई करेंसी बनाने पर 100 फीसदी टैरिफ की धमकी तक दी थी। इसलिए भारत को यह भी देखना होगा कि BRICS की पहल अमेरिका के साथ उसके रिश्तों को नुकसान न पहुंचाए। भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि BRICS का मकसद डॉलर को हटाने के लिए कोई साझा करेंसी बनाना नहीं है। इसके बजाय राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर है।
मध्य पूर्व का संकट BRICS के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दों में है। ईरान अमेरिका के खिलाफ कड़ा रुख चाहता है, जबकि सऊदी अरब और UAE ईरान के हमलों का मुद्दा उठा सकते हैं। भारत के इन तीनों देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर मजबूत संबंध हैं। मई में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक भी मध्य पूर्व को लेकर मतभेदों के बीच बिना संयुक्त बयान के खत्म हुई थी। ऐसे में भारत के लिए सर्वसम्मति वाला घोषणापत्र तैयार करना आसान नहीं होगा।
पूर्व G20 शेरपा अमिताभ कांत और अन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता एक "अनुभवी और समझदार खिलाड़ी" की तरह करनी होगी। भारत ने हमेशा ब्रिक्स को 'ग्लोबल साउथ' का मंच माना है, न कि पश्चिम-विरोधी गुट। भारत का मकसद किसी एक खेमे का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि सभी वैश्विक शक्तियों के साथ मिलकर काम करना और एक संतुलित साझा घोषणापत्र जारी करना है।
SCO के बिश्केक घोषणापत्र में भारत ने ईरान पर हमलों की निंदा की थी। अब BRICS में उसे किसी एक गुट के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। पूर्व राजनयिकों और विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारत को अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन के साथ समानांतर रूप से काम करते हुए BRICS को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकना होगा। भारत के सामने लक्ष्य साफ है-किसी एक पक्ष का साथ दिए बिना ऐसा साझा बयान तैयार करना, जिसे विरोधी खेमों में खड़े सदस्य भी स्वीकार कर सकें। यही इस BRICS Summit में नई दिल्ली की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।
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