
बिहार की धरती का इतिहास जितना पुराना है, वहां के युवाओं के संघर्ष की कहानियां उतनी ही नई और प्रेरणादायक हैं। पटना की संकरी गलियों में हर सुबह लाखों सपने सरकारी नौकरी की आस में जागते हैं, जहां कभी किसी कमरे की हल्की रोशनी के नीचे तो कभी भोर के अंधेरे में मैदानों में दौड़ते हुए भविष्य बुना जाता है। इन्हीं सपनों को हकीकत में बदलने का काम कर रहे हैं खान सर, जिन्होंने शिक्षा को व्यापार नहीं, बल्कि सेवा बना दिया है।
बड़े-बड़े कोचिंग संस्थानों की भारी फीस के बीच महज कुछ रुपयों में देश के सबसे गरीब बच्चों को अफसर बनने का ख्वाब दिखाना और उसे पूरा करना एक क्रांति से कम नहीं है। आज मैं आपको उन तीन चेहरों की कहानी बताने जा रहा हूं, जो अभावों की आग में तपकर कुंदन बने हैं। ये वो कहानियां हैं जो यह साबित करती हैं कि सफलता कभी महलों की मोहताज नहीं होती।
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संघर्ष क्या होता है, यह खान ग्लोबल स्टडीज के उस छात्र से बेहतर कौन जान सकता है जिसने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कोचिंग सेंटर में ही मजदूरी की। जब यह छात्र पटना में खान सर के पास पढ़ने आया था, तब उसके पास हॉस्टल और लॉज का किराया देने तक के पैसे नहीं होते थे। पैसों की कमी को पूरा करने के लिए इस युवा ने कभी हार नहीं मानी और कोचिंग के निर्माण कार्य में हाथ बंटाना शुरू कर दिया।
खान सर खुद भावुक होकर बताते हैं कि जब कोचिंग का नया हॉल बन रहा था, तो इसी छात्र ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ 15 इंच चौड़ी दीवार को तोड़ने का काम किया था। लोहे के पाइप उतारने से लेकर लकड़ी और प्लाई का हिसाब रखने तक, उसने हर वह काम किया जो उसे उसकी मंजिल के करीब रख सके। अपनी गरीबी को अपनी कमजोरी न बनने देते हुए, इस युवा ने दिन-रात एक कर दिया और आज उसका चयन बिहार पुलिस में हो गया है। यह कहानी दिखाती है कि जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, वह जीतने के लिए किसी भी हद तक मेहनत कर सकता है।
खगड़िया जिले के एक छोटे से गांव से आने वाले मंटू कुमार की कहानी हर उस युवा के लिए मिसाल है, जो संसाधनों का रोना रोकर पीछे हट जाते हैं। एक गरीब किसान परिवार में जन्मे मंटू ने अपनी कड़ी मेहनत और खान सर के मार्गदर्शन से बीपीएससी परीक्षा पास की और एसडीएम (SDO) का पद हासिल किया।
मंटू की सफलता के पीछे उनके बड़े भाई का भी अहम योगदान रहा, जिन्होंने पिता की तरह अपनी सारी जिम्मेदारियां निभाईं। अपनी पढ़ाई के दिनों को याद करते हुए मंटू बताते हैं कि वह लगातार घंटों पढ़ाई करते थे। जब कमरे में पढ़ते-पढ़ते थक जाते थे, तो कभी छत पर और कभी सीढ़ियों पर बैठकर अपनी पढ़ाई जारी रखते थे। खान सर के सस्ते और आसान ऑनलाइन व ऑफलाइन माध्यम ने मंटू जैसे ग्रामीण छात्रों के लिए शिक्षा की राह आसान कर दी, जिससे आज वह एक अधिकारी बनकर अपने परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं।
हमारी तीसरी कहानी दरसिंहसराय के रहने वाले छोटू की है, जो इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि अगर हौसले बुलंद हों तो झोपड़ी से भी कामयाबी की उड़ान भरी जा सकती है। छोटू के पिता गांव में मजदूरी और खेती करते हैं और उनका घर एक कच्ची झोपड़ी है, जिसकी छत से बारिश का पानी टपकता है।
इसी झोपड़ी में एक फटे हुए नक्शे और मात्र एक बल्ब की धीमी रोशनी के नीचे बैठकर छोटू ने 12वीं की परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक हासिल किए और पूरे जिले में दूसरा स्थान प्राप्त किया। आर्थिक तंगी के कारण छोटू पटना जाकर तैयारी नहीं कर सका, लेकिन खान सर की ऑनलाइन कक्षाओं और उनके द्वारा पढ़ाए गए एटलस की मदद से छोटू ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की प्रवेश परीक्षा भी शानदार अंकों से पास कर ली है। अब उसका अगला लक्ष्य खान सर के मार्गदर्शन में यूपीएससी क्रैक कर अधिकारी बनना है, ताकि वह अपने पिछड़े इलाके में शिक्षा की अलख जगा सके।
खान सर की लोकप्रियता का असल कारण उनका पढ़ाने का वह अनूठा अंदाज है जिसने शिक्षा का सरलीकरण कर दिया है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उनके ऐप पर करोड़ों डाउनलोड्स हैं, बल्कि यह है कि उन्होंने बैटरी रिक्शा चलाने वाले से लेकर झोपड़ी में रहने वाले मजदूर के बच्चों तक को शिक्षा से जोड़ दिया है।
जब करोड़ों रुपये के ऑफर ठुकरा कर कोई शिक्षक गरीब बच्चों के जीवन में रोशनी भरने का प्रण लेता है, तो मंटू और छोटू जैसे युवाओं का अफसर बनना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि इतिहास का एक नया अध्याय बन जाता है। ये कहानियां उन लाखों छात्रों के लिए एक उम्मीद हैं, जो हर सुबह अपनी गरीबी से लड़कर एक बेहतर कल का सपना देखते हैं।
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