
PM Modi Israel Visit Impact on Pakistan: पीएम मोदी के इजरायल दौरे ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस यात्रा के दौरान भारत-इजरायल के बीच रक्षा, साइबर सिक्योरिटी और हथियारों से जुड़ी कई अहम डील और समझौते हुए, जिसने कहीं न कहीं पाकिस्तान की टेंशन बढ़ा दी है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इजरायल के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी पाकिस्तानी सेना के लिए सुरक्षा चुनौती बन सकती है।
अल-जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, पीएम मोदी की मौजूदगी में नेतन्याहू ने 'आयरन अलायंस' का जिक्र किया, जिसका मकसद इस्लामिक कट्टरता से मुकाबला करना बताया गया। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे गठबंधन को तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश संदेह की नजर से देख सकते हैं।
2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और खासकर 2017 में उनके तेल अवीव दौरे के बाद भारत-इजरायल संबंधों में तेजी आई है। आज भारत, इजरायल का सबसे बड़ा हथियार खरीदार माना जाता है। रक्षा क्षेत्र के अलावा दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे उभरते क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा रहे हैं। अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत रहे मसूद खान का मानना है कि पीएम मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान होने वाले कई रणनीतिक समझौते पिछले साल पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए समझौते के काउंटर की तरह देखे जा सकते हैं। इजरायल के पहले से अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों के साथ भी ऐसे रणनीतिक समझौते हैं।
वहीं, चीन में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मसूद खालिद ने कहा कि पिछले साल भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान इजरायली ड्रोन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ हुआ था। अब रक्षा, काउंटर टेररिज्म, साइबर सिक्योरिटी और एआई जैसे क्षेत्रों में सहयोग और मजबूत किया जा रहा है। नेतन्याहू का Hexagon प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसमें ऐसे पहलू हैं जो पाकिस्तान जैसे देशों को असहज कर सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह गठबंधन उन देशों और समूहों के खिलाफ होगा, जो पॉलिटिकल इस्लाम से जुड़े हैं और इजरायल की नीतियों की आलोचना करते हैं। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र मुस्लिम देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं। यह तथ्य लंबे समय से इजरायल की रणनीतिक चिंताओं में शामिल रहा है। साथ ही, पाकिस्तान तुर्की और सऊदी अरब के साथ एक सुन्नी धुरी का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में इजरायल, भारत के साथ रक्षा सहयोग और इंटेलिजेंस शेयरिंग को और बढ़ा सकता है।
पाकिस्तान की चिंता सिर्फ भारत-इजरायल नजदीकी तक सीमित नहीं है। उसकी नजर खाड़ी देशों पर भी है। दशकों से पाकिस्तान आर्थिक मदद के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहा है। इसमें रोल-ओवर लोन और विदेशों में काम कर रहे पाकिस्तानियों की रेमिटेंस शामिल हैं। पाकिस्तान सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत जैसे मिडिल ईस्ट देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखना चाहता है, क्योंकि ये उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं।
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