कौन थी वो महिला जिसे भारत में सबसे पहले मिली थी फांसी की सजा, गुनाह ऐसा कि कलेजा कांप जाए

Published : Oct 14, 2026, 07:22 PM IST
death sentence

सार

Meerut Murder Case :मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद उस महिला के बारे में जानिए, जिसे आजाद भारत में पहली फांसी की सजा सुनाई गई थी।

मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को 14 अक्टूबर 2026 को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई। इस फैसले के बाद देश में मौत की सजा पाने वाली महिलाओं का इतिहास भी चर्चा में है। इसी कड़ी में रतनबाई जैन का नाम सामने आता है, जिसे तीन लड़कियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। आखिर कौन थी रतनबाई जैन और उसने ऐसा क्या किया था कि उसे फांसी की सजा दी गई?

कौन थी रतनबाई जैन?

रतनबाई जैन दिल्ली में एक स्टेरिलिटी क्लिनिक में मैनेजर के तौर पर काम करती थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वह अपने पति के साथ रहती थी। उस समय वह एक कामकाजी महिला थी, लेकिन पति को लेकर उसके मन में शक पैदा हो गया था। यही शक आगे चलकर तीन लड़कियों की हत्या की वजह बना।

पति पर शक के चलते की तीन लड़कियों की हत्या

  • रतनबाई को शक था कि उसके पति के तीन लड़कियों के साथ संबंध हैं। बताया जाता है कि ये लड़कियां उस क्लिनिक से जुड़ी थीं, जहां वह काम करती थी।
  • इसी शक के चलते उसने तीनों लड़कियों को मारने की योजना बनाई। रिपोर्टों के अनुसार, रतनबाई ने तीनों के खाने-पीने की चीजों में जहर मिला दिया। जहर के कारण तीनों लड़कियों की मौत हो गई। इस मामले में जांच के बाद अदालत ने उसे हत्या का दोषी ठहराया।

3 जनवरी 1955 को दी गई थी फांसी

  • रतनबाई जैन को तीन लड़कियों की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में उसे फांसी दे दी गई। उसे आजाद भारत में फांसी पर चढ़ाई जाने वाली पहली और अब तक की एकमात्र महिला माना जाता है।

मुस्कान रस्तोगी के मामले से क्यों हो रही तुलना?

  • मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद रतनबाई जैन का मामला फिर चर्चा में आ गया है। हालांकि, दोनों मामलों की परिस्थितियां और अपराध के तथ्य अलग-अलग हैं।
  • यह भी समझना जरूरी है कि अदालत से मौत की सजा मिलना और वास्तव में फांसी दिया जाना अलग-अलग बातें हैं। मौत की सजा के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील और कानून के तहत अन्य विकल्प मौजूद होते हैं। इसलिए सजा सुनाए जाने के बाद दोषी को तुरंत फांसी नहीं दी जाती।

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