बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में दोबारा चुनाव की मांग को लेकर सियासी विवाद तेज है। जानिए SIR और वोटर लिस्ट से जुड़े आरोप क्या हैं और कानून के तहत क्या किसी पूरे राज्य में दोबारा चुनाव कराया जा सकता है।
5 राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग से मचा सियासी घमासान
भारत में चुनाव सिर्फ EVM का बटन दबाने और नतीजे आने तक की प्रक्रिया नहीं है। वोटर लिस्ट से लेकर मतदान, काउंटिंग और चुनावी रिकॉर्ड तक हर चरण के लिए अलग नियम हैं। ऐसे में जब मतदाता सूची या चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो विवाद सीधे चुनाव की वैधता तक पहुंच जाता है।
फिलहाल SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष के सवालों के बीच बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली और हरियाणा में दोबारा चुनाव की मांग चर्चा में है। लेकिन क्या सिर्फ राजनीतिक मांग से किसी राज्य में चुनाव फिर से कराया जा सकता है? जवाब है- नहीं।
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किन 5 राज्यों में उठी दोबारा चुनाव की मांग?
विपक्षी नेताओं ने अलग-अलग राज्यों के चुनावों को लेकर सवाल उठाए हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल में RJD नेता तेजस्वी यादव ने दोबारा चुनाव की मांग की है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे ने भी नए सिरे से चुनाव कराने की बात कही है। दिल्ली और हरियाणा के पुराने मतदाता सूची व चुनाव प्रक्रिया संबंधी आरोप भी फिर चर्चा में हैं। हालांकि इन दावों की प्रकृति अलग-अलग है और किसी भी राज्य में सिर्फ राजनीतिक मांग से चुनाव स्वतः रद्द नहीं होता।
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SIR और वोटर लिस्ट से क्यों जुड़ा विवाद?
ताजा विवाद SIR के दौरान मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर बढ़ा है। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR से जुड़े मामलों में 38,20,683 अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें 1,02,231 का निपटारा हो चुका था और 37,18,452 लंबित थीं। आयोग के अनुसार अपीलें नाम जोड़ने और हटाने, दोनों से जुड़ी थीं। दिल्ली में भी SIR के दौरान ‘logical discrepancy’ वाले नोटिसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा। अदालत ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अतिरिक्त जांच और स्पष्टता की जरूरत बताई।
बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और हरियाणा में क्या आरोप हैं?
बिहार में विपक्ष ने मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया और चुनाव के दौरान सरकारी सहायता से जुड़े सवाल उठाए हैं। पश्चिम बंगाल में नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया बड़ा मुद्दा बनी हुई है। महाराष्ट्र और हरियाणा में भी विपक्षी दलों ने वोटर लिस्ट और चुनावी प्रक्रिया को लेकर पहले आरोप लगाए थे। लेकिन किसी आरोप का सामने आना अपने आप चुनाव में धांधली साबित नहीं करता। संबंधित रिकॉर्ड, आपत्तियों, जांच और न्यायिक प्रक्रिया में ही इन दावों की पुष्टि या खारिज होने की स्थिति स्पष्ट होगी।
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क्या पूरे राज्य में फिर से चुनाव कराया जा सकता है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम कानूनी सवाल है। Representation of the People Act, 1951 के तहत चुनाव को चुनौती देने के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया है। कानून की धारा 100 में कुछ परिस्थितियों में हाई कोर्ट द्वारा किसी निर्वाचित उम्मीदवार का चुनाव शून्य घोषित करने का प्रावधान है, जैसे भ्रष्ट आचरण या ऐसी अनियमितता जिससे चुनाव का परिणाम प्रभावित हुआ हो। इसलिए “दोबारा चुनाव की मांग” का अर्थ यह नहीं है कि पूरे राज्य में फिर मतदान तय हो गया है।
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आगे क्या तय करेगा चुनाव का भविष्य?
अब विवाद का अगला चरण अदालतों में दाखिल याचिकाओं, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड और SIR से जुड़े दावों-आपत्तियों के निपटारे पर निर्भर करेगा। चुनाव आयोग आधिकारिक रूप से चुनाव प्रक्रिया संचालित करने वाली संवैधानिक संस्था है और मतदाता सूची की तैयारी व संशोधन भी निर्धारित कानूनी ढांचे में होता है।
ऐसे में पांच राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग फिलहाल राजनीतिक मांग है, कोई घोषित पुनर्मतदान नहीं। यदि किसी चुनाव में ऐसी अनियमितता कानूनी रूप से साबित होती है जो परिणाम को प्रभावित करती है, तभी संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई संभव है।
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