
Trump Drug 200 Percent Tariff: वैश्विक व्यापार और स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा आक्रामक आर्थिक ऐलान किया है, जिसने भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग (दवा उद्योग) की रातों की नींद उड़ा दी है। ट्रंप ने जेनेरिक दवाओं पर एक बेहद विवादास्पद और चौंकाने वाली टैरिफ योजना पेश की है। इसके तहत आयातित (Imported) जेनेरिक दवाओं पर दो साल के लिए तो 0% की दर रखी गई है, लेकिन उसके बाद यह ड्यूटी बढ़कर सीधे 100% और अंततः भारी-भरकम 200% हो जाएगी। 'दुनिया की फार्मेसी' कहे जाने वाले भारत के लिए ट्रंप के इस कदम के क्या मायने हैं और यह कैसे वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र को हिला सकता है, आइए समझते हैं।
ट्रंप की इस नई नीति के मुताबिक, अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक कोई टैक्स नहीं लगेगा। पहली नज़र में यह राहत लग सकती है, लेकिन असल में यह एक टाइम-बम की तरह है। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि यह दो साल का समय कोई छूट नहीं, बल्कि विदेशी दवा कंपनियों को अपना पूरा प्रोडक्शन बेस समेटकर अमेरिका में शिफ्ट करने की आखिरी चेतावनी है। यदि कंपनियां दो साल के भीतर अपनी मैन्युफैक्चरिंग को अमेरिका नहीं ले जाती हैं, तो 2028 से उन पर 100% की भारी इंपोर्ट ड्यूटी लगेगी, जिसे बाद में बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा। कोविड-19 महामारी के बाद से ही अमेरिका में यह चिंता बढ़ गई थी कि वह दवाओं के लिए विदेशों पर हद से ज्यादा निर्भर है। अब ट्रंप इस निर्भरता को बलपूर्वक खत्म करना चाहते हैं।
TRUMP ANNOUNCES 100% TARIFF ON IMPORTED GENERIC DRUGS !!!
US President Donald Trump has announced that imported generic medicines will continue to face 0% tariff for the next two years, after which a 100% tariff will be imposed from August 2028, rising further to 200% a year… pic.twitter.com/V6vlAjQJQG— Ravi Prakash Official (@raviprakash_rtv) July 22, 2026
भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में से एक है। अमेरिकी बाजार में बिकने वाली बड़ी संख्या में जेनेरिक दवाएं भारतीय कंपनियों से आती हैं। एंटीबायोटिक्स, मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी कई जरूरी दवाओं की आपूर्ति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि भविष्य में 100% या 200% टैरिफ लागू होते हैं तो भारतीय दवाओं की कीमत अमेरिका में काफी बढ़ सकती है। इससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होने का खतरा रहेगा।
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भारत के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि अमेरिका भारतीय दवा उद्योग का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट है। अमेरिका में बिकने वाली अधिकांश जेनेरिक दवाएं—जैसे एंटीबायोटिक्स, डायबिटीज की दवाएं और गंभीर कैंसर की दवाएं-भारत से ही जाती हैं। ट्रंप के इस फैसले से भारत की कई शीर्ष फार्मा कंपनियों के रेवेन्यू मॉडल पर सीधा खतरा मंडराने लगा है। विश्लेषकों के अनुसार, जिन दिग्गज कंपनियों पर इसका सबसे गहरा और गंभीर असर पड़ सकता है, उनमें शामिल हैं:
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन कंपनियों के पास पहले से ही अमेरिका में थोड़े-बहुत मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं, वे तो जैसे-तैसे इस संकट को झेल जाएंगी। लेकिन, जो छोटी और मध्यम कंपनियां पूरी तरह से भारत में दवा बनाकर अमेरिका भेजने पर निर्भर हैं, उनका वजूद ही खतरे में पड़ सकता है।
इस पूरी रणनीति का एक और स्याह पहलू भी है, जो खुद अमेरिकी नागरिकों को डरा रहा है। अमेरिका में डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली अधिकांश दवाएं जेनेरिक होती हैं, क्योंकि वे ब्रांडेड दवाओं की तुलना में बेहद सस्ती होती हैं। अगर दो साल बाद 200% का भारी टैरिफ लागू हो जाता है, तो भारत से आने वाली सस्ती दवाओं की लागत तीन गुना बढ़ जाएगी। दवा कंपनियां इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को खुद नहीं उठाएंगी, बल्कि वे इसका पूरा भार अमेरिकी डिस्ट्रीब्यूटर्स, इंश्योरेंस कंपनियों और अंततः गरीब मरीजों की जेब पर डाल देंगी। इसके अलावा, फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग को रातों-रात इलेक्ट्रॉनिक्स की तरह शिफ्ट करना नामुमकिन है, इसके लिए US FDA की सख्त मंजूरियों और करोड़ों डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि कंपनियों ने घाटे के डर से अमेरिका को सप्लाई बंद कर दी, तो वहां जीवनरक्षक दवाओं की भयंकर किल्लत हो सकती है।
कुछ भारतीय कंपनियां पहले से अमेरिका में उत्पादन कर रही हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट करना आसान नहीं होगा। इसके लिए अरबों रुपये के निवेश, नई फैक्ट्रियों, प्रशिक्षित कर्मचारियों, अमेरिकी नियामक मंजूरियों और मजबूत सप्लाई चेन की आवश्यकता होगी। छोटी और मध्यम कंपनियों के लिए यह बदलाव विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाएगा? डोनाल्ड ट्रंप की एक पुरानी आदत रही है कि वे व्यापार वार्ताओं (Trade Negotiations) में दबाव बनाने के लिए अक्सर टैरिफ के बड़े-बड़े ऐलान करते हैं। मुमकिन है कि यह भारत और चीन जैसे देशों से अन्य डील्स मनवाने की एक चाल हो। भविष्य में होने वाली भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में अब यह मुद्दा सबसे ऊपर रहने वाला है। भारत सरकार निश्चित रूप से नई दिल्ली की तरफ से अमेरिकी प्रशासन के सामने जीवनरक्षक दवाओं के लिए विशेष छूट, कम टैरिफ रेट या फिर इस दो साल की ट्रांजिशन अवधि को और बढ़ाने की मांग रखेगी। बहरहाल, तात्कालिक रूप से भले ही कोई संकट न हो, लेकिन लंबे समय के लिहाज से भारतीय फार्मा सेक्टर के सामने यह सदी की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
ट्रंप पहले भी व्यापारिक वार्ताओं में टैरिफ को दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर चुके हैं। लेकिन इस बार अमेरिका में घरेलू दवा निर्माण को बढ़ावा देने की नीति को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन मिल रहा है। इसलिए इसे केवल बातचीत की रणनीति मानना जल्दबाजी होगी।
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