Women's Reservation Bill: लोकसभा में क्यों गिरा महिला आरक्षण बिल, 2029 में लागू करने की थी तैयारी

Published : Apr 17, 2026, 10:38 PM IST

लोकसभा में 2029 तक महिला आरक्षण लागू करने वाला संविधान संशोधन बिल गिर गया। बिल को पास होने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। इसके पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। विपक्ष ने सरकार के इस कदम की जमकर आलोचना की।

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लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक

लोकसभा ने शुक्रवार को एक अहम संविधान संशोधन विधेयक खारिज कर दिया। इसका मकसद 2029 से चुनावों में महिला आरक्षण को तेजी से लागू करना था। बिल में नई जनगणना का इंतजार किए बिना परिसीमन करने का भी प्रस्ताव था। वोटिंग करने वाले 528 सदस्यों में से 298 ने बिल का समर्थन किया, जबकि 230 ने इसका विरोध किया। हालांकि, बिल पास करने के लिए यह काफी नहीं था।

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बिल क्यों पास नहीं हुआ

संविधान संशोधन विधेयक को पास होने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि इसे सदन में मौजूद और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन मिलना चाहिए। इस मामले में, सरकार को 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन सिर्फ 298 वोट ही मिले। नतीजतन, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बिल के फेल होने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा, “सदन में वोटिंग के दौरान 2/3 बहुमत नहीं मिलने के कारण संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पास नहीं हो सका।”

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बिल का उद्देश्य क्या था

यह प्रस्तावित संशोधन 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' से जुड़ा था। इसका उद्देश्य था: 2029 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करना, लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करना और पिछली जनगणना के आधार पर परिसीमन करना। सरकार ने कहा कि अगले आम चुनाव से पहले आरक्षण व्यवस्था को लागू करने के लिए ये कदम जरूरी थे।

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महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष की आपत्तियाँ

कई विपक्षी दलों ने बिल का विरोध किया। उन्होंने नई जनगणना के बिना परिसीमन पर चिंता जताई। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि यह बिल असल में महिलाओं की मदद के लिए नहीं था। उन्होंने कहा, “हमने लोकसभा में बिल को हरा दिया है। हमने हमेशा कहा है कि बिल का मकसद महिलाओं का उत्थान नहीं, बल्कि देश की चुनावी संरचना को बदलना था।” उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पिछले महिला आरक्षण अधिनियम को लागू करने के लिए भी कहा और विपक्ष के समर्थन का वादा किया।

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सरकार की प्रतिक्रिया क्या रहीं

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में लंबी बहस के दौरान बिल का बचाव किया।

उन्होंने इस कदम का विरोध करने के लिए विपक्षी दलों की आलोचना की और कहा कि उन्हें भविष्य के चुनावों में महिला मतदाताओं के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है।

बिल के फेल होने के बाद, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार दो संबंधित बिलों - केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक - के साथ आगे नहीं बढ़ेगी।

बाद में उन्होंने बिल वापस ले लिया और सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया गया।

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परिसीमन में बदलाव सहित संबंधित प्रस्ताव फिलहाल आगे नहीं बढ़ेंगे

महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 16 से 18 अप्रैल तक आयोजित संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान चर्चा की गई एक बड़ी योजना का हिस्सा था। इस बिल के फेल होने का मतलब है कि परिसीमन में बदलाव सहित संबंधित प्रस्ताव फिलहाल आगे नहीं बढ़ेंगे।

संविधान संशोधन विधेयकों के लिए नियम

ऐसे बिलों को पास करने की प्रक्रिया सख्त होती है। बिल पेश करने के लिए साधारण बहुमत काफी है, लेकिन इसे पास करने के लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। कुछ मामलों में, कम से कम आधे राज्य विधानसभाओं से भी मंजूरी की जरूरत पड़ती है। इससे व्यापक समर्थन के बिना बड़े संवैधानिक बदलावों को पास करना मुश्किल हो जाता है।

परिसीमन एक प्रमुख मुद्दा क्यों बना

परिसीमन का मतलब संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना है। सरकार पिछले उपलब्ध जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करना चाहती थी। हालांकि, विपक्षी दलों ने तर्क दिया कि पहले एक नई जनगणना की जानी चाहिए। उन्हें डर था कि अपडेटेड जनसंख्या आंकड़ों के बिना सीटों की संख्या और सीमाओं को बदलने से निष्पक्ष प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

आगे इसका क्या मतलब है

बिल का खारिज होना यह दर्शाता है कि सरकार के पास लोकसभा में अपने दम पर बड़े संवैधानिक बदलावों को पारित करने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है। यह महिला आरक्षण को कैसे लागू किया जाना चाहिए, इस पर सरकार और विपक्ष के बीच गहरे मतभेदों को भी उजागर करता है। फिलहाल, इस तरीके का उपयोग करके 2029 तक कोटा लागू करने की योजना में देरी हो गई है।

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