
Xi Jinping India Visit: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आ रहे हैं। साल 2019 में महाबलीपुरम में हुई मुलाकात के बाद, लगभग सात साल में यह उनकी पहली भारत यात्रा है। 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद दोनों देशों के बीच उपजे गहरे कूटनीतिक अविश्वास और सैन्य तनातनी के बीच यह बैठक काफी मायने रखती है। शनिवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत में रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश होगी।
बातचीत के मेज पर सबसे बड़ा मुद्दा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव घटाना होगा। अक्टूबर 2024 में सीमा पर गश्त को लेकर बने समझौते और अगस्त 2025 में हुई उच्च स्तरीय वार्ताओं ने बर्फ पिघलाने का काम किया है। इसके बाद ही सीधी उड़ानें शुरू हुईं और वीज़ा नियमों में ढील दी गई। हालांकि, लगभग 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा पर सेना की तैनाती, अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के बेतुके दावे और बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर का मुद्दा अब भी भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के बीच भारी असंतुलन है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों के बीच 151 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, लेकिन इसमें भारत का व्यापार घाटा ही रिकॉर्ड 112 अरब डॉलर रहा। भारत चीनी पुर्जों और तकनीक पर अपनी निर्भरता घटाने के साथ व्यापार संतुलन चाहता है। इसके अलावा, तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे विशाल 60,000 मेगावाट के मेडोग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर भी भारत में चिंताएं हैं, क्योंकि इससे निचले इलाकों में पानी के बहाव पर असर पड़ सकता है।
अमेरिका के साथ बदलती व्यापारिक नीतियों और वैश्विक उथल-पुथल के दौर में भारत और चीन दोनों ही एक-दूसरे से कामचलाऊ रिश्ते बनाए रखना चाहते हैं। ब्रिक्स और एससीओ (SCO) जैसे मंचों पर चीन खुद को मजबूत रखना चाहता है, वहीं भारत अमेरिका के साथ क्वाड (Quad) में अपनी साझेदारी को मजबूत कर संतुलन बना रहा है। अब देखना यह होगा कि शनिवार को होने वाली यह द्विपक्षीय बातचीत सिर्फ औपचारिक बनकर रह जाती है या सीमा और व्यापार के मामलों में कोई ठोस नतीजा सामने लाती है।
सीधी उड़ानों, वीजा प्रक्रिया और लोगों के बीच संपर्क को आसान बनाना भी रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश का हिस्सा है। इसके साथ तकनीक, बिजनेस मोबिलिटी और निवेश से जुड़ी पाबंदियों को कम करने पर बातचीत संभव है।
BRICS मंच पर भारत और चीन कई मुद्दों पर साथ दिखाई देते हैं, लेकिन सुरक्षा और रणनीतिक मामलों में दोनों के हित हमेशा एक जैसे नहीं हैं। अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते, चीन-पाकिस्तान संबंध और इंडो-पैसिफिक की राजनीति भी इस पूरी तस्वीर को प्रभावित करती है। इसलिए मोदी-शी बैठक को रिश्तों का पूरा “रीसेट” मानना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा यह होगी कि क्या बातचीत से सीमा पर स्थिरता, व्यापार में संतुलन और आपसी भरोसे को आगे बढ़ाने के लिए ठोस रास्ता निकलता है।
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