
रायपुर। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत बीजापुर जिले के ग्राम निम्मलगुड़ा में जल संरक्षण और ग्रामीण विकास की दिशा में एक सराहनीय पहल देखने को मिली है। गांव में 500 जल अवशोषण ट्रेंच का निर्माण किया गया, जिससे न केवल वर्षा जल को संरक्षित करने में मदद मिली है, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार भी उपलब्ध हुआ है। यह कार्य इस बात का उदाहरण बनकर सामने आया है कि यदि मनरेगा योजनाओं को सही तरीके से लागू किया जाए तो वे रोजगार के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इस परियोजना के लिए कुल 4 लाख 95 हजार 73 रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। निर्माण कार्य पूरा करने में 4 लाख 70 हजार 61 रुपये खर्च किए गए। काम के दौरान कुल 1,801 मानव-दिवस का रोजगार सृजित हुआ। इससे गांव के कई परिवारों को स्थानीय स्तर पर काम मिला और उन्हें रोजगार के लिए बाहर जाने की आवश्यकता कम हुई। ग्रामीणों की आय में भी सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई।
गांव में बनाए गए जल अवशोषण ट्रेंच का असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। बारिश का पानी पहले की तुलना में अधिक मात्रा में जमीन में समा रहा है, जिससे भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा मिला है। इसके अलावा मिट्टी के कटाव को रोकने में भी मदद मिली है। खेतों में लंबे समय तक नमी बनी रहने से किसानों को फायदा हो रहा है और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद बढ़ी है।
स्थानीय किसानों का मानना है कि जल संरक्षण के इन प्रयासों का असर आने वाले समय में खेती पर भी दिखाई देगा। खेतों में नमी बने रहने और भू-जल स्तर सुधरने से फसलों को पर्याप्त पानी मिलने की संभावना बढ़ेगी। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे कार्य कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करते हैं।
निम्मलगुड़ा में किया गया यह कार्य केवल मजदूरों को रोजगार देने तक सीमित नहीं रहा। इस परियोजना ने जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में भी सकारात्मक परिणाम दिए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के कार्य सतत विकास की अवधारणा को मजबूत करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने में मददगार साबित होते हैं।
ग्राम निम्मलगुड़ा का यह प्रयास मनरेगा के प्रभावी क्रियान्वयन और जनभागीदारी का एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा है। जल संरक्षण और रोजगार सृजन को साथ लेकर चलने वाला यह मॉडल अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी सीख साबित हो सकता है। यह पहल दिखाती है कि योजनाओं का सही उपयोग किया जाए तो वे गांवों के विकास, पर्यावरण संरक्षण और लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।
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