CIDSCON-2026: वायरल बुखार में ये गलती न करें! डॉक्टरों ने एंटीबायोटिक को लेकर दी बड़ी चेतावनी

Published : Aug 20, 2026, 09:33 PM IST
Viral Fever Warning Doctors Advise Against Unnecessary Antibiotics Raise Concern Over Fungal Resistance

सार

CIDSCON-2026 में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने वायरल बुखार में बिना जांच एंटीबायोटिक्स से बचने की सलाह दी। फंगल इंफेक्शन और एंटीफंगल रेजिस्टेंस को भी बड़ी चुनौती बताया गया। युवा डॉक्टरों को सटीक निदान, उपचार और AI के इस्तेमाल पर प्रशिक्षण मिला।

गांधीनगर में संक्रामक रोगों को लेकर देशभर के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने एक अहम संदेश दिया है—हर बुखार का इलाज एंटीबायोटिक नहीं है। सामान्य वायरल या मौसमी बुखार में बिना उचित जांच और निदान के एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल भविष्य में बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है। इसी के साथ फंगल इंफेक्शन और एंटीफंगल दवाओं के प्रति बढ़ता रेजिस्टेंस भी डॉक्टरों के लिए नई चुनौती बनकर सामने आया है।

गांधीनगर के महात्मा मंदिर में CIDSCON-2026 की मुख्य कॉन्फ्रेंस से पहले युवा डॉक्टरों और पोस्ट ग्रेजुएट रेजिडेंट्स के लिए विशेष वर्कशॉप आयोजित की गईं। इन सत्रों में संक्रमण की पहचान, उपचार, एंटीबायोटिक स्टेवर्डशिप, इंफेक्शन कंट्रोल और मरीजों के इलाज में AI के इस्तेमाल जैसे मुद्दों पर विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण दिया।

वायरल बुखार में बिना जांच एंटीबायोटिक से बचें

CIDSCON के सह-आयोजन अध्यक्ष और श्री स्वामिनारायण इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस एंड रिसर्च, कलोल के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. हर्ष तोषनीवाल ने एंटीबायोटिक्स के जिम्मेदार इस्तेमाल पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वायरल बुखार या सामान्य मौसमी बुखार जैसे मामलों में एंटीबायोटिक्स देने से बचना चाहिए। उनका कहना है कि डॉक्टरों को मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री लेने, शारीरिक जांच करने और जरूरत के मुताबिक लैब टेस्ट का सहारा लेकर बीमारी का सटीक निदान करना चाहिए। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस यानी बैक्टीरिया का इन दवाओं के प्रति कम प्रभावी होना चिकित्सा क्षेत्र की बड़ी चुनौतियों में शामिल है। ऐसे में बिना जरूरत इन दवाओं का इस्तेमाल कम करना जरूरी है, ताकि जब वास्तव में जरूरत हो तब उनका प्रभाव बना रहे।

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सामान्य दाद अब इतना आसान नहीं, फंगल इंफेक्शन ने बढ़ाई चिंता

माइकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. एम. आर. शिवप्रकाश ने फंगल इंफेक्शन को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एंटीबैक्टीरियल रेजिस्टेंस पर तो चर्चा होती है, लेकिन एंटीफंगल रेजिस्टेंस को लेकर भी गंभीरता जरूरी है। उन्होंने दाद यानी डर्माटोफाइटोसिस या रिंगवर्म का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले कई मामलों में सामान्य उपचार से यह संक्रमण नियंत्रित हो जाता था, लेकिन अब कुछ संक्रमण अधिक जिद्दी रूप में सामने आ रहे हैं। लंबे समय तक बने रहने वाले और शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैलने वाले संक्रमणों में सही निदान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

डॉ. शिवप्रकाश ने डॉक्टरों से फंगल संक्रमण की सटीक पहचान, एंटीफंगल दवाओं के संभावित विषैले प्रभाव और उनके फार्माकोकाइनेटिक्स को समझने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि एंटीफंगल स्टेवर्डशिप को एंटीबैक्टीरियल स्टेवर्डशिप से अलग तरीके से समझना और लागू करना चाहिए।

कमजोर इम्युनिटी वाले मरीजों के इलाज पर भी फोकस

वर्कशॉप में ऐसे मरीजों के उपचार पर भी विशेष चर्चा हुई, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। डायबिटीज, किडनी फेल्योर या ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी स्थितियों वाले मरीजों में संक्रमण का इलाज अधिक जटिल हो सकता है। ‘द जीरो डिफेंस चैलेंज’ वर्कशॉप में चिकित्सकों को ऐसे मामलों में संक्रमण की पहचान और उपचार की चुनौतियों से निपटने के बारे में मार्गदर्शन दिया गया। वहीं सर्जिकल प्रैक्टिस में संक्रमण नियंत्रण और एंटीबायोटिक्स के उचित इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई।

संक्रमण की जांच में AI और नई तकनीक पर भी चर्चा

CIDSCON-2026 के पूर्वार्ध में आयोजित वर्कशॉप्स का एक महत्वपूर्ण हिस्सा AI एंड टेक्नोलॉजी इन ID प्रैक्टिस रहा। इसमें संक्रामक रोगों की पहचान और उपचार में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा आधुनिक तकनीक की संभावित भूमिका पर चिकित्सकों को जानकारी दी गई। मुंबई की माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. अंजली शेट्टी ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से इंफेक्शन कंट्रोल, माइक्रोबायोलॉजी और संक्रामक रोगों को लेकर वैज्ञानिक जागरूकता का संदेश देशभर में पहुंच सकता है।

युवा डॉक्टरों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रशिक्षण?

सहभागी चिकित्सक डॉ. चिंतन जादव के मुताबिक, ऐसी वर्कशॉप युवा पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टरों को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में आने वाली चुनौतियों को समझने और मरीजों के बेहतर उपचार में मदद करती हैं। वर्कशॉप में ID 360: Mastering the Basics, Microbiology 360: Diagnostics, Stewardship and Infection Control, The Zero Defense Challenge, AI and Technology in ID Practice और ID Issues in Surgical Practice जैसे सत्र आयोजित किए गए।

इन सत्रों का मुख्य उद्देश्य यही रहा कि संक्रमण का इलाज केवल दवा लिखने तक सीमित न रहे, बल्कि सही इतिहास, जांच, निदान, संक्रमण नियंत्रण और दवाओं के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को उपचार का जरूरी हिस्सा बनाया जाए। गांधीनगर में हुई यह पहल ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब संक्रामक रोगों के उपचार में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के साथ-साथ फंगल इंफेक्शन और एंटीफंगल रेजिस्टेंस भी चिकित्सा समुदाय के सामने चुनौती बन रहे हैं। विशेषज्ञों का संदेश स्पष्ट है—सटीक निदान पहले और दवा का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार।

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