नई दिल्ली। बिहार में 243 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव (Bihar Assembly Elections) की सरगर्मियां तेज हैं। हालांकि अभी शेड्यूल की घोषणा नहीं हुई है, मगर बिहार के साथ ही साथ कुछ राज्यों में भी नवंबर के आखिर तक उपचुनाव कराए जाना तय है। चुनाव लोकतांत्रिक देशों में एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए मतदाता उम्मीदों पर खरा न उतरने वाले दलों, प्रतिनिधियों को हराने या जिताने का अधिकार पाते हैं। जनता के यही प्रतिनिधि सरकार बनाते और चलाते हैं। लोकतंत्र में सरकार और सिस्टम का कंट्रोल जनता को वोट की शक्ति के जरिए मिलता है। जो सोचते हैं कि एक अकेले वोट से कोई फर्क नहीं पड़ता (One Vote Importance) उन्हें 31 साल पहले आंध्रप्रदेश की अनाकपल्ली (Anakapalli) लोकसभा सीट पर हार-जीत के अंतर को देख लेना चाहिए। 

31 साल पहले 1989 का चुनाव का कई मायनों में ऐतिहासिक था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajeev Gandhi) का नेतृत्व कसौटी पर था। राजीव सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। हर तरफ रक्षा सौदे में खरीदी गई बोफोर्स तोप (Bofors Gun) में घूस और दलाली का मुद्दा छाया था। जनता दल (Janta Dal) समेत पूरा विपक्ष कांग्रेस (Congress) के खिलाफ था। वीपी सिंह (VP Singh) के नेतृत्व में जनता दल के नेता हर गली, रैली और सभा में बहुत आक्रामक तरीके से बोफोर्स का मसला उठा रहे थे। राजीव गांधी के परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। 

राजीव को हराया, मगर सरकार नहीं चला पाए वीपी सिंह 
उस चुनाव के नतीजे संभावना के अनुरूप ही थे। आजाद भारत के इतिहास में इमरजेंसी के बाद दूसरी बार कांग्रेस की बुरी हार हुई और केंद्र की सत्ता हाथ से चली गई। चुनाव में कांग्रेस ऐसी सीटों पर भी साख नहीं बचा पाई जो उसका गढ़ कहे जाते थे। आंध्रप्रदेश (AndhraPradesh) की अनाकपल्ली सीट अपवाद के रूप में अलग है। जिसकी जानकारी आगे दी जाएगी। बहरहाल, ये दूसरी बात है कि मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू करने और बीजेपी (BJP) के राममंदिर आंदोलन (Ram Mandir Movement) की वजह से बाद में वीपी सिंह की सरकार गिर गई और जनता दल में भी टूट गया और अल्प समय के लिए वीपी सिंह की जगह चंद्रशेखर सिंह (ChandraShekhar Singh) की सरकार बनी। फिर अस्थिर राजनीति की वजह से देश को एक और मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा।    
  
 

बोफोर्स के मुद्दे पर थी तगड़ी मोर्चेबंदी  
1989 के चुनाव में बोफोर्स के मुद्दे पर पूरे देश में गैरकांग्रेसी दलों ने राजीव गांधी के खिलाफ मजबूत मोर्चेबंदी की थी। आंध्रप्रदेश में कांग्रेस के सबसे मजबूत किले अनाकपल्ली में भी विपक्ष ने काफी तैयारी की थी। कांग्रेस यहां इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में भी नहीं हारी थी। ये दूसरी बात है कि इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के निधन के बाद उपजे देशव्यापी संवेदना की लहर के बावजूद 1984 के चुनाव में यहां पहली बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। जबकि उस चुनाव में पूरे देश में विपक्ष का सूपड़ा साफ हुआ था। 

कांग्रेस को थी अनहोनी की आशंका 
1989 के चुनाव में कांग्रेस को यहां अनहोनी की आशंका थी। इसी वजह से पिछले तीन चुनाव से लगातार प्रतिनिधित्व करने वाले नायडू का टिकट काटकर रामकृष्ण (Ram Krishna) को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया था। यहां कांग्रेस का सीधा मुक़ाबला तेलगुदेशम पार्टी (TDP) उम्मीदवार नरसिम्हा से था। चुनाव में उम्मीद के मुताबिक ही कांटे की लड़ाई हुई। कांग्रेस उम्मीदवार रामकृष्ण को 2,99,109 वोट मिले। जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी TDP उम्मीदवार को 2,99,100 वोट मिले। हारजीत का फैसला सिर्फ 9 वोटों से हुआ था। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार लोकसभा की किसी सीट पर इतने कम अंतर से हारजीत का फैसला हुआ। TDP उम्मीदवार की मांग पर रीकाउंटिंग हुई। यह रिकॉर्ड आज भी है। हालांकि 1998 में तत्कालीन बिहार की राजमहल (Rajmahal) लोकसभा सीट पर भी 9 वोट से ही हारजीत का फैसला हुआ था। 

कीमती हो गए थे एक-एक वोट 
अनाकपल्ली में हार-जीत के लिए एक-एक वोट कीमती हो गए थे। रीकाउंटिंग में कर्मचारियों ने भी पसीने छोड़ दिए। तब चुनाव बैलेट पेपर से होते थे और मतगणना में काफी वक्त लगता था। हालांकि अंत में कांग्रेस उम्मीदवार की जीत घोषित की गई। बाद में जब 1991 में फिर चुनाव हुए तो यहां कांग्रेस उम्मीदवार रामकृष्ण ने आसानी से जीत दर्ज कर ली। लेकिन पिछले 30 साल में समय के साथ आंध्रप्रदेश के क्षेत्रीय दल ताकतवर होते गए और कांग्रेस का यह गढ़ उसके हाथ से निकल गया। 1991 के बाद 2019 तक सिर्फ दो बार कांग्रेस यह सीट जीत पाई है। फिलहाल यहां वाईएसआर कांग्रेस (YSR Congress) का कब्जा है।  एक वोट की क्या कीमत होती है इसे समझने के लिए शायद 1989 में अनाकपल्ली के नतीजों से बेहतर उदाहरण कोई और नहीं।