घर खरीदने जा रहे हैं? ये 7 छुपे चार्ज उड़ा सकते हैं ₹2-3 लाख एक्स्ट्रा
Home Loan Hidden Costs: अगर आप अपना पहला घर खरीदने जा रहे हैं या होम लोन ट्रांसफर करने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ ब्याज देखना लाखों का नुकसान करा सकता है। होम लोन के अंदर छुपे 7 अलग-अलग तरह के चार्ज इसे महंगा बना सकते हैं। जानिए इनसे कैसे बच सकते हैं..

1. प्रोसेसिंग, लीगल और सरकारी फीस
हर होम लोन की शुरुआत कुछ अपफ्रंट चार्ज से होती है, जिन्हें ज्यादातर फर्स्ट-टाइम बायर्स नजरअंदाज कर देते हैं। प्रोसेसिंग और एडमिन चार्ज में बैंक आपकी एप्लीकेशन जांच, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और क्रेडिट चेक का खर्च जोड़ता है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के अनुसार, ये फीस आमतौर पर लोन अमाउंट का 0.25% से 1% तक होती है और कई बार कैप भी होती है। इसके अलावा लीगल और टेक्निकल वेरिफिकेशन के लिए बैंक प्रॉपर्टी की वैल्यू और टाइटल क्लियरेंस जांचता है। स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन बैंक कंट्रोल में नहीं होते, लेकिन ये बड़ा खर्च होते हैं और राज्य के हिसाब से बदलते हैं। अगर बैंक 'जीरो प्रोसेसिंग फीस' ऑफर दे रहा है, तो भी लीगल फीस, वैल्यूएशन चार्ज, MODT और एडमिन कॉस्ट पर मोलभाव जरूर करें।
2. प्रीपेमेंट और फोरक्लोजर चार्ज
कई लोग सोचते हैं कि जल्दी लोन चुकाना हमेशा फायदेमंद है, लेकिन यहां भी शर्तें छुपी होती हैं। RBI नियमों के अनुसार, फ्लोटिंग रेट होम लोन पर प्रीपेमेंट चार्ज नहीं लगता। लेकिन फिक्स्ड या हाइब्रिड रेट लोन पर बैंक 4% तक पेनल्टी लगा सकता है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पार्ट-प्रीपेमेंट करने पर बैंक आमतौर पर EMI वही रखकर लोन टेन्योर घटा देता है, जिससे लंबे समय में ब्याज बचता है। हालांकि आप चाहें तो EMI कम कराने का ऑप्शन भी मांग सकते हैं। इसलिए पहले से यह साफ कर लेना जरूरी है।
3. कन्वर्जन चार्ज
मार्केट बदले तो आप फ्लोटिंग से फिक्स्ड या उल्टा जाना चाह सकते हैं। बैंक यह सुविधा देते हैं, लेकिन इसके बदले कन्वर्जन फीस लेते हैं। यह फीस आमतौर पर आउटस्टैंडिंग अमाउंट का 0.25-0.5% होती है। यानी ₹40 लाख बकाया पर ₹10,000-₹20,000 सीधा खर्च बढ़ जाता है। मतलब 20 साल के टेन्योर में 2-3 लाख रुपए एक्स्ट्रा तक खर्च करने पड़ सकते हैं। कन्वर्जन करने से पहले कैलकुलेट करें कि नई ब्याज दर से होने वाली बचत, इस फीस से ज्यादा है या नहीं। कई बार पुरानी दर पर बने रहना ही सस्ता पड़ता है।
4. बैलेंस ट्रांसफर
कुछ साल बाद दूसरा बैंक कम ब्याज पर बैलेंस ट्रांसफर का ऑफर दे सकता है। लेकिन एक्सपर्ट अलर्ट करते हैं कि यह तभी फायदेमंद है जब ब्याज का अंतर वाकई बड़ा हो और सर्विस शर्तें बेहतर हों। नए बैंक में फिर से प्रोसेसिंग फीस, लीगल चार्ज, वैल्यूएशन, MODT लग सकते हैं। साथ ही पुराने लोन पर अगर फिक्स्ड या हाइब्रिड रेट है, तो फोरक्लोजर पेनल्टी भी देनी पड़ सकती है।
5. EMI लेट होने की कीमत
EMI भूलना या अकाउंट में बैलेंस कम होना आपको भारी पड़ सकता है। बैंक ओवरड्यू EMI पर हर महीने 3% तक पेनल्टी लगा सकते हैं। ज्यादातर बैंक 5-10 दिन का ग्रेस पीरियड देते हैं, लेकिन इसके बाद चार्ज और बाउंस फीस जुड़ जाती है। सिर्फ पैसे का नुकसान ही नहीं, क्रेडिट स्कोर भी गिरता है, जिससे आगे लोन लेना मुश्किल हो सकता है। ऑटो-डेबिट सेट करना और बैलेंस बनाए रखना सबसे आसान उपाय है।
6. जबरदस्ती बीमा
होम लोन के साथ दो तरह के बीमा आते हैं। प्रॉपर्टी इंश्योरेंस आमतौर पर जरूरी होता है, क्योंकि वही बैंक की गारंटी है। लेकिन लोन प्रोटेक्शन इंश्योरेंस (टर्म प्लान) ऑप्शनल होता है। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि विवाद तब होता है जब बैंक बिना साफ सहमति के सिंगल-प्रीमियम बीमा लोन में जोड़ देता है। आपको अपने पसंद के इंश्योरर से पॉलिसी लेने या अलग टर्म प्लान चुनने का पूरा अधिकार है।
7. CERSAI चार्ज
CERSAI चार्ज से प्रॉपर्टी का मॉर्गेज सेंट्रल डेटाबेस में रजिस्टर होता है, ताकि एक ही घर पर कई लोन न लिए जा सकें। ₹5 लाख तक के लोन पर ₹50 और GST लगता है, उससे ऊपर ₹100 और GST लगता है। लोन क्लोज होने के बाद यह जरूर चेक करें कि रिकॉर्ड 'सैटिस्टफाईड' अपडेट हो गया हो, वरना भविष्य में घर बेचने या री-फाइनेंस में दिक्कत आ सकती है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी कोई सलाह नहीं है। होम लोन से जुड़े नियम, शुल्क और शर्तें बैंक, एनबीएफसी और समय के अनुसार बदल सकती हैं। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले संबंधित बैंक या वित्तीय सलाहकार से पूरी जानकारी और सलाह जरूर लें।

