29 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर मिशेल युंग ने 2 करोड़ की नौकरी छोड़ दी। उन्होंने मन की शांति के लिए मैनहट्टन में अपना 'माचा' कैफे खोला। अब वह कम कमाकर भी ज़्यादा खुश और संतुष्ट हैं।

आज के ज़माने में हर कोई एक अच्छी, मोटी सैलरी वाली आईटी जॉब का सपना देखता है। लेकिन एक 29 साल की लड़की ऐसी भी है, जिसने करोड़ों की सैलरी और शानदार ज़िंदगी को छोड़कर अपना खुद का 'माचा' कैफे शुरू किया और आज वो बहुत खुश है। इस लड़की का नाम है मिशेल युंग। मिशेल एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थीं और उनकी सालाना कमाई 2।5 लाख डॉलर, यानी भारतीय रुपयों में करीब 2 करोड़ से भी ज़्यादा थी। CNBC 'मेक इट' की रिपोर्ट के मुताबिक, मिशेल ने यह नौकरी छोड़कर मैनहट्टन में 'माचा हाउस' नाम से अपना कैफे खोल लिया है।

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यूनिवर्सिटी ऑफ़ वाशिंगटन से ग्रेजुएशन के बाद मिशेल ने आईटी सेक्टर में काम शुरू किया। उनकी शुरुआती सैलरी ही 1,60,000 डॉलर थी, जो कुछ ही समय में बढ़कर 2,50,000 डॉलर हो गई। मिशेल का बचपन पैसों की तंगी में बीता था, इसलिए शुरुआत में उनके लिए पैसा कमाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य था। लेकिन जब उन्होंने खूब पैसा कमा लिया, तब भी उन्हें मन का सुकून नहीं मिला। मिशेल बताती हैं, 'मैं बस एक मशीन की तरह काम कर रही थी। मैं अक्सर सोचती थी कि मैं यह सब क्यों कर रही हूं। आखिरकार, मैंने इस लग्ज़री ज़िंदगी से बाहर निकलने का फैसला किया।'

जब मिशेल न्यूयॉर्क के माचा आउटलेट्स पर गईं, तो उन्हें इस बिजनेस में मौके नज़र आए। माचा एक तरह की जापानी ग्रीन टी होती है। लेकिन उन्होंने झटपट नौकरी नहीं छोड़ी, बल्कि पूरी प्लानिंग की। वह माचा बनाने का तरीका सीखने के लिए जापान गईं। कैफे कैसे काम करते हैं, यह समझने के लिए उन्होंने मशहूर कॉफी ब्रांड स्टारबक्स में पार्ट-टाइम नौकरी भी की।

उन्होंने अपनी सेविंग्स में से 1।5 लाख डॉलर (करीब 1।25 करोड़ रुपये) से ज़्यादा अपने कैफे के लिए लगाए। आखिरकार, 2025 में उन्होंने मैनहट्टन में 'माचा हाउस' की शुरुआत कर दी। शुरुआत में कई मुश्किलें आईं, लेकिन दोस्तों और परिवार के सपोर्ट से वह आगे बढ़ती रहीं।

आज मिशेल अपने कैफे से जो सैलरी लेती हैं, वह उनकी पुरानी आईटी जॉब की सैलरी का दसवां हिस्सा ही है। यानी साल के करीब 27 लाख रुपये। उन्होंने अपनी शानदार ज़िंदगी छोड़कर एक सादा जीवन अपना लिया है। उनका कैफे मुनाफे में है, लेकिन मिशेल कहती हैं कि अब उनके लिए पैसा या मुनाफा नहीं, बल्कि ज़िंदगी का सुकून ज़्यादा ज़रूरी है, जो उन्हें अब भरपूर मिल रहा है।