Teachers Who Changed Lives: कौन कहता है टीचर सिर्फ पाठ पढ़ाते हैं? इन शिक्षकों ने बच्चों की जिंदगी बदल दी। किसी को स्कूल में रोका, किसी को सपने देखने का हौसला दिया। पढ़िए उनकी कहानी!
Real Teacher Stories: टीचर सिर्फ किताब का पाठ पढ़ाने वाला इंसान नहीं होता। कई बार एक शिक्षक किसी बच्चे के लिए वह इंसान बन जाता है, जो उसके अंदर छिपी क्षमता सबसे पहले पहचानता है। किसी को स्कूल छोड़ने से रोकता है, किसी की फीस भरता है, किसी को पढ़ाई का दूसरा चांस देता है तो किसी को यह भरोसा दिलाता है कि वह भी बड़ा सपना देख सकता है। भारत में ऐसे कई टीचर हैं, जिन्होंने मुश्किल हालात में बच्चों का साथ दिया। उनकी कहानियां बताती हैं कि शिक्षा सिर्फ नंबर और परीक्षा तक सीमित नहीं है। सही टाइम पर मिला एक टीचर का साथ किसी बच्चे की पूरी जिंदगी बदल सकता है।
1. पेलिनो पेटेनिल्हु- कोहिमा, नागालैंड
नागालैंड के जॉन गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल, विस्वेमा, कोहिमा की टीचर पेलिनो पेटेनिल्हु उन शिक्षकों में हैं, जिनके लिए बच्चे सिर्फ स्कूल की जिम्मेदारी नहीं हैं। उन्होंने पैसों से कमजोर छात्रों को पढ़ाई से जुड़े खर्च में हेल्प की और कई बार घर जाकर यह समझने की कोशिश की कि बच्चा स्कूल क्यों नहीं आ रहा है। उनकी एक कहानी 17 वर्षीय ‘जॉन’ की है। माता-पिता की मौत के बाद वह संकट से जूझ रहा था। वह पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पा रहा था। पेलिनो उसके घर पहुंचीं, परिवार से बात की, उसे एक्स्ट्रा टाइम दिया और पढ़ाई में वापस आने में मदद की। बाद में वह अपनी पढ़ाई पूरी करने में सफल रहा। एक दूसरे छात्र विजो की पढ़ाई पैसों की वजह से रुकने वाली थी। पेलिनो ने उसके उसकी ट्यूशन फीस में मदद की।
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2. एम. वेंकटरमणा- हैदराबाद, तेलंगाना
मैथ टीचर एम. वेंकटरमणा ने पैसों से कमजोर छात्रों को सिर्फ पढ़ाया नहीं, बल्कि उनके लिए मार्गदर्शक और मददगार की भूमिका भी निभाई। उनके छात्र नवीन की कहानी खास है। सरकारी हाई स्कूल से पढ़ने वाले नवीन को आगे की पढ़ाई के लिए दिशा और आर्थिक सहायता की जरूरत थी। वेंकटरमणा ने उसकी पढ़ाई और कोचिंग में मदद की। बाद में नवीन को NIT कालीकट में दाखिला मिला। वेंकटरमणा का काम यह दिखाता है कि प्रतिभा गरीब या अमीर देखकर पैदा नहीं होती। फर्क इस बात से पड़ता है कि प्रतिभा को सही दिशा देने वाला कोई है या नहीं।
3. रंजीतसिंह दिसाले - सोलापुर, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के परिटेवाड़ी गांव में टीचर रंजीतसिंह दिसाले ने लड़कियों की शिक्षा को लेकर बड़ा बदलाव किया। जब उन्होंने स्कूल में काम शुरू किया, तब लड़कियों की पढ़ाई में रुचि कम थी और कम उम्र में शादी की समस्या भी मौजूद थी। उन्होंने किताबों को बच्चों की लोकल भाषा से जोड़ने के साथ उनमें QR Code का यूज किया। इससे बच्चे किताब के पाठ के साथ ऑडियो, वीडियो और दूसरी डिजिटल सामग्री तक पहुंच सकते थे। उनके प्रयासों से स्कूल में लड़कियों का अटेंडेंस 100% तक पहुंची और गांव में बाल विवाह की सोच भी बदली। दिसाले को 2020 में ग्लोबल टीचर प्राइज मिला।
4. दीप नारायण नायक - पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल के जामुरिया नमोपाड़ा फ्री प्राइमरी स्कूल के टीचर दीप नारायण नायक को ‘Wall Teacher’ के नाम से भी जाना जाता है। उनका काम खास तौर पर उन बच्चों के बीच रहा, जिनके पास पढ़ाई के कुछ भी नहीं था। कोरोना महामारी के दौरान जब स्कूल बंद थे, तब उन्होंने गांव की दीवारों को ही ब्लैकबोर्ड बना दिया। इससे बच्चों को घर के आसपास ही पढ़ने का मौका मिला। उनका मकसद सिर्फ पाठ पढ़ाना नहीं था, बल्कि उन परिवारों तक शिक्षा पहुंचाना था जहां स्कूल बंद होने का मतलब पढ़ाई पूरी तरह बंद हो जाना था।
5. डेबाजित घोष- डिब्रूगढ़, असम
असम के नामसांग टी एस्टेट मॉडल स्कूल, डिब्रूगढ़ के टीचर और प्रिंसिपल डेबाजित घोष ने चाय बागान क्षेत्र के बच्चों के लिए जबरदस्त काम किया। वह स्कूल पहुंचने के लिए लगभग 150 किमी की यात्रा करते थे। इस इलाके में कई बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते थे। घोष और उनकी टीम ने बच्चों और उनके परिवारों से संपर्क किया। तीन सालों में 267 बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा में लाने का श्रेय उन्हें दिया गया है। एक छात्र पढ़ाई और लिखने में कमजोर था। घोष ने उसकी समस्या सॉल्व की। लगातार सही डायरेक्शन के बाद उसी छात्र ने असम बोर्ड की क्लास 10 की परीक्षा में साइंस में 100 मार्क और कुल 93% हासिल किए।
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6. सुमन गोयल - दिल्ली
दिल्ली की टीचर सुमन गोयल की अपनी जिंदगी भी संघर्ष की कहानी है। उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए कभी सिर्फ 60 रुपए हर दिन पर बच्चों को पढ़ाया था। बाद में वह सरकारी स्कूल की टीचर बनीं और उसी एरिया के बच्चों के साथ काम करने लगीं। उनके कई छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं जहां माता-पिता दिहाड़ी मजदूर, दर्जी या दूसरे छोटे काम करते हैं। गोयल बच्चों के लिए सिर्फ पढ़ाई पर फोकस नहीं देतीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर कपड़े-स्टेशनरी जैसी चीजों का भी इंतजाम करती हैं। उन्होंने मैथ सीखने के लिए निपुण मैथ्स किट (NIPUN Maths Kit) भी तैयार की।
7. राधा राजेश - बेंगलुरु, कर्नाटक
बेंगलुरु के न्यू होराइजन पब्लिक स्कूल, इंदिरानगर की बायोलॉजी टीचर राधा राजेश का तरीका थोड़ा अलग है। वह किताब के सबसे हार्ड सब्जेक्ट को वास्तविक जिंदगी की कहानियों से जोड़ती हैं। मिसाल के तौर पर- वह Growth Hormone समझाते समय फुटबॉलर लियोनेल मेसी की बचपन की कहानी का यूज करती हैं। Nervous System पढ़ाते समय अपने पिता के पार्किंसंस से जुड़े अनुभव को उदाहरण बनाती हैं और Brain Injury समझाने के लिए माइकल शूमाकर की घटना का रिफ्रेंस देती हैं। उनके पूर्व छात्र आज डॉक्टर, रिसर्चर और दूसरे पेशों में हैं। कुछ छात्र वापस आकर बताते हैं कि उनकी पढ़ाई ने बायोलॉजी को देखने का नजरिया बदल दिया।
8. अरविंद गुप्ता - पुणे से देश-दुनिया तक
अरविंद गुप्ता ने बच्चों को साइंस सिखाने के लिए महंगे उपकरणों के बजाय कबाड़ और रोजमर्रा की चीजों का यूज किया। पुराने अखबार, माचिस की तीलियां, स्ट्रॉ, बोतल और दूसरी साधारण चीजों से उन्होंने साइंस के मॉडल और खिलौने बनाए। उनकी वर्कशॉप में बच्चों को साइंस सिर्फ पढ़ाया नहीं जाता था, बल्कि खुद चीजें बनाकर समझाया जाता था। उनके काम का एक बेहद दिलचस्प उदाहरण दुर्गा जेट्टी नाम की छात्रा है, जो स्कूल आने से पहले कई घरों में बर्तन साफ करती थी। उसने बेकार बोतलों से टर्बाइन बनाया। उसके काम की न्यूज पब्लिश हुई और उसे कई लोगों से आर्थिक मदद मिली। बाद में वह इंजीनियर बनी।
9. उर्वशी साहनी - लखनऊ, उत्तर प्रदेश
लखनऊ की टीचर और स्टडी हॉल एजुकेशनल फाउंडेशन की संस्थापक डॉ. उर्वशी साहनी ने खास तौर पर लड़कियों की शिक्षा और आत्मविश्वास पर काम किया है। उनका संस्थान लड़कियों को सिर्फ स्कूल तक पहुंचाने के बजाय उन्हें अपनी बात कहने और अपने अधिकार समझने के लिए तैयार करने पर भी जोर देता है। स्टडी हॉल की शुरुआत 1986 में सिर्फ 6 बच्चों के साथ हुई थी। आज उनका काम बड़े स्तर पर बच्चों और शिक्षकों तक पहुंच चुका है।
10. आनंद कुमार - पटना, बिहार
आनंद कुमार का नाम Super 30 के कारण देशभर में जाना जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को IIT-JEE जैसी कठिन एग्जाम्स की तैयारी कराने के लिए उन्होंने Super 30 की शुरुआत की। उनकी अपनी जिंदगी भी आर्थिक संघर्ष से भरी रही। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एंट्री का मौका मिलने के बावजूद पैसा ना होने के कारण वह वहां नहीं जा सके। बाद में उन्होंने मैथ पढ़ाना शुरू किया और गरीब परिवारों के होनहार छात्रों को फ्री या बेहद कम फीस पर तैयारी कराने का रास्ता चुना।
इन कहानियों में सबसे बड़ी बात क्या है?
इन टीचरों ने बच्चों को सिर्फ स्टूडेंट नहीं समझा। बल्कि एक टीचर ने बच्चे की आर्थिक परेशानी देखी, दूसरे ने उसके घर का माहौल समझा, किसी ने उसकी प्रतिभा पहचानी और किसी ने उसके अंदर कॉन्फीडेंस पैदा किया। इसलिए Teachers’ Day सिर्फ शिक्षकों को फूल और कार्ड देने का दिन नहीं है। यह याद करने का मौका भी है कि हमारी जिंदगी में ऐसे कौन से टीचर रहे, जिन्होंने हमें उस समय आगे बढ़ाया जब शायद हमें खुद पर भी भरोसा नहीं था।
