यह तस्वीर कोरोना संक्रमण को रोकने लोगों की सूझबूझ को दिखाती हैं। यह पढ़े-लिखे उन लोगों के लिए सबक भी है, जो बेवजह लॉकडाउन का उल्लंघन कर रहे हैं। खासकर शहरी इलाकों में लॉकडाउन के उल्लंघन के रोज मामले सामने आ रहे हैं। कोरोना को रोकने के लिए लॉकडाउन से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। झारखंड के आदिवासियों ने इस बात को समझा और अपने घरों में ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी।

दुमका, झारखंड. कोरोना संक्रमण को रोकने सोशल डिस्टेंसिंग से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसके लिए लॉकडाउन लागू किया गया है। यह तस्वीर कोरोना संक्रमण को रोकने लोगों की सूझबूझ को दिखाती हैं। यह पढ़े-लिखे उन लोगों के लिए सबक भी है, जो बेवजह लॉकडाउन का उल्लंघन कर रहे हैं। खासकर शहरी इलाकों में लॉकडाउन के उल्लंघन के रोज मामले सामने आ रहे हैं। कोरोना को रोकने के लिए लॉकडाउन से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। झारखंड के आदिवासियों ने इस बात को समझा और अपने घरों में ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी।

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किसी को बुलाना है, तो आवाज लगानी पड़ती है..
यह तस्वीर दुमका से करीब 60 किमी दूर जरमुंडी प्रखंड के बदरामपुर गांव की है। यह इलाका आदिवासी बाहुल्य है। कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद यहां के लोगों ने लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है। गांववालों ने लॉकडाउन शुरू होते ही सबसे पहले गांव की सीमाएं सील कर दी थीं। यानी आने-जाने पर टोटल पाबंदी। अब कुछ गांववालों ने अपने घरों के आगे बांस-बल्लियों से लक्ष्मण रेखा बना दी है। यानी कोई दूसरा बिना इजाजत घर के अंदर नहीं आ सकता। उसे किसी को बुलाना जोर से पुकारना ही पड़ेगा। यह घर दिलीप टुडू का है। उनके परिवार में 7 सदस्य हैं, जिनमें दो मासूम बच्चे भी हैं। दिलीप ने बताया कि बड़ों की तो ठीक, लेकिन बच्चों को क्या मालूम कि कोरोना क्या है? वे घर से बाहर न निकलें, इसलिए यह उपाय करना पड़ा।

मंत्री ने की सराहना..
जब यह खबर कृषि मंत्री बादल पत्रलेख का मिली, तो उन्होंने एक टीम को भेजकर आदिवासी परिवार को सम्मानित कराया। परिवार को मास्क और सैनिटाइजर भी दिए। कांग्रेस जिलाध्यक्ष श्यामल किशोर ने कहा कि आदिवासी ने जिस तरह सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं, वो सराहनी है।