Mughal E Azam Interesting facts about Salim Casting: 'मुगल-ए-आजम' में सलीम के किरदार के लिए दिलीप कुमार पहली पसंद नहीं थे। निर्देशक K. आसिफ ने उन्हें रिजेक्ट कर किसी और को चुना था। बाद में फिल्म दोबारा बनने पर दिलीप कुमार को यह भूमिका मिली, जो ऐतिहासिक बन गई।
हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में शुमार ‘मुगल-ए-आजम’ की कहानी पर्दे पर जितनी भव्य नजर आई, उसके बनने की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। आज जब भी सलीम का नाम लिया जाता है तो जेहन में दिलीप कुमार का चेहरा आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस ऐतिहासिक किरदार के लिए दिलीप कुमार निर्देशक K. आसिफ की पहली पसंद नहीं थे? दरअसल, फिल्म के शुरुआती दौर में उन्हें सलीम के रोल के लिए रिजेक्ट कर दिया गया था।
दिलीप कुमार को क्यों किया गया था रिजेक्ट?
साल 1946 में जब K. आसिफ ने पहली बार ‘मुगल-ए-आजम’ बनाने का सपना देखा, तब उन्होंने युवा दिलीप कुमार को प्रिंस सलीम के किरदार के लिए उपयुक्त नहीं माना। निर्देशक को लगा कि उस समय दिलीप कुमार के व्यक्तित्व में एक मुगल शहजादे जैसी शाही भव्यता नजर नहीं आती थी। उन्हें सलीम के किरदार के लिए ज्यादा रॉयल स्क्रीन प्रेजेंस वाला अभिनेता चाहिए था। यही वजह थी कि K. आसिफ ने उस समय दिलीप कुमार की जगह एक अनुभवी अभिनेता को सलीम बनाने का फैसला किया। यह अभिनेता डी.के. सप्रू थे।
और पढ़ें - जीजा-साली में 36 का आंकड़ा, डिंपल कपाड़िया की बहन को ‘कचरा’ समझते थे राजेश खन्ना? सिंपल की आपबीती
सलीम बने थे डी.के. सप्रू
डी.के. सप्रू यानी दयाकिशन सप्रू उस दौर के जाने-माने चरित्र अभिनेता थे। उनकी भारी आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और शाही अंदाज ने K. आसिफ को प्रभावित किया था। इसलिए फिल्म के शुरुआती वर्जन में सलीम की भूमिका डी.के. सप्रू ने निभाई थी। इस शुरुआती फिल्म में नरगिस अनारकली और चंद्र मोहन बादशाह अकबर के किरदार में थे। बताया जाता है कि फिल्म की करीब 25 प्रतिशत शूटिंग भी पूरी हो चुकी थी, लेकिन इसके बाद देश के इतिहास में एक ऐसा दौर आया जिसने फिल्म की पूरी दिशा बदल दी।

Partition ने बदल दी ‘मुगल-ए-आजम’ की कहानी
साल 1947 में देश के बंटवारे के कारण फिल्म की शूटिंग पर भी गहरा असर पड़ा। फिल्म के फाइनेंसर पाकिस्तान चले गए और प्रोजेक्ट अधर में लटक गया। इसके बाद साल 1949 में अभिनेता चंद्र मोहन के निधन ने इस शुरुआती वर्जन को पूरी तरह खत्म कर दिया। इस तरह K. आसिफ को अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म को नए सिरे से शुरू करना पड़ा। साल 1952 में जब K. आसिफ ने नए निवेश और नई टीम के साथ ‘मुगल-ए-आजम’ को दोबारा शुरू किया तो उन्होंने फिल्म की स्टारकास्ट में भी बड़ा बदलाव किया। इस बार पृथ्वीराज कपूर को अकबर, दिलीप कुमार को सलीम, मधुबाला को अनारकली और दुर्गा खोटे को जोधाबाई के रूप में कास्ट किया गया। फिल्म में निगार सुल्ताना, अजीत और मुराद जैसे कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आए। यानी जिस दिलीप कुमार को शुरुआती दौर में सलीम के लिए सही नहीं माना गया था, वही बाद में इस किरदार की पहचान बन गए।
डी.के. सप्रू ने भी बनाई अपनी अलग पहचान
‘मुगल-ए-आजम’ के शुरुआती वर्जन के बंद होने के बाद डी.के. सप्रू का करियर रुका नहीं। उन्होंने आगे चलकर 350 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और हिंदी सिनेमा के चर्चित चरित्र अभिनेताओं में अपनी जगह बनाई। सप्रू को अक्सर सख्त जज, जमींदार, खलनायक और प्रभावशाली किरदारों में देखा गया। ‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘पाकीजा’, ‘दीवार’, ‘काला पानी’, ‘हीर रांझा’, ‘जंजीर’ और ‘धर्म वीर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को याद किया जाता है।
और पढ़ें - Mahesh Babu Net Worth: 80Cr फीस, प्राइवेट जेट के मालिक, जानें कितनी है टॉलीवुड सुपरस्टार की दौलत

एक्टिंग के साथ परिवार भी रहा फिल्मी दुनिया से जुड़ा
डी.के. सप्रू ने 1948 में IPTA थिएटर से जुड़ी कलाकार हेमवती से शादी की। उनके परिवार के कई सदस्य आगे चलकर मनोरंजन जगत से जुड़े। उनके बेटे तेज सप्रू ने हिंदी फिल्मों में अभिनय किया, जबकि बेटी प्रीति सप्रू पंजाबी सिनेमा में अभिनेत्री और निर्देशक के तौर पर जानी गईं। वहीं रीमा राकेश नाथ ने लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में काम किया। उनके बेटे करण नाथ ने भी बाद में बॉलीवुड में कदम रखा। डी.के. सप्रू का निधन 20 अक्टूबर 1979 को 63 साल की उम्र में हुआ। उनकी कुछ फिल्में उनके निधन के बाद रिलीज हुईं।
आज भी क्यों खास है ‘मुगल-ए-आजम’?
‘मुगल-ए-आजम’ भारतीय सिनेमा की उन फिल्मों में शामिल है, जिसने भव्यता, अभिनय, संगीत और कहानी—हर स्तर पर एक अलग मिसाल कायम की। फिल्म में दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी आज भी याद की जाती है। फिल्म के संगीत को भी अमर माना जाता है। नौशाद के संगीत और शकील बदायूंनी के गीतों ने कहानी में नई जान डाल दी। खासतौर पर ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित गीतों में गिना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिस फिल्म में दिलीप कुमार का सलीम किरदार इतिहास बन गया, उसी फिल्म के शुरुआती वर्जन में निर्देशक ने उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं माना था। किस्मत का यही मोड़ आगे चलकर हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे यादगार कास्टिंग फैसलों में से एक बन गया।
