Vande Mataram debate: मुकेश खन्ना ने वंदे मातरम पर शर्मिला टैगोर के बयान पर सवाल उठाए, कहा कि दूसरे धर्मों की चिंता इस गीत के नजरिए को क्यों प्रभावित करे। उन्होंने ‘33 करोड़ देवी-देवता’ वाली बात, ‘सिर्फ खुदा के आगे झुकने’ के तर्क और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान पर अपना रुख स्पष्ट किया।
Vande Mataram controversy: ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी बहस अब फिल्मी दुनिया के कलाकारों के बयानों तक पहुंच गई है। अभिनेता मुकेश खन्ना ने अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। खन्ना का कहना है कि किसी दूसरे धर्म से जुड़ी आशंकाओं के आधार पर ‘वंदे मातरम’ को देखने का नजरिया प्रभावित नहीं होना चाहिए।
शर्मिला टैगोर के बयान पर मुकेश खन्ना ने जताई आपत्ति
मुकेश खन्ना के मुताबिक, शर्मिला टैगोर अपनी समझ और अनुभव के आधार पर अपनी बात रख रही होंगी, लेकिन उन्हें इस बात पर आपत्ति है कि ‘वंदे मातरम’ को लेकर दूसरे धर्मों की चिंताओं को बहस का आधार क्यों बनाया जाए।
खन्ना ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को किसी धार्मिक या व्यक्तिगत कारण से कुछ आपत्ति है, तो उसे अपनी जगह रखा जा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि पूरे राष्ट्रगीत को ही संदेह या अस्वीकार की नजर से देखा जाए।
‘दूसरे धर्मों की चिंता वंदे मातरम पर क्यों असर डाले?’
अभिनेता ने सवाल उठाया कि यदि ‘वंदे मातरम’ को लेकर यह कहा जाता है कि दूसरे धर्मों के लोग इसे शायद स्वीकार न करें, तो ऐसी सोच राष्ट्रगीत के प्रति नजरिए को क्यों प्रभावित करे।
उनके मुताबिक, इस मुद्दे को निजी आस्था और धार्मिक पहचान से अलग करके भी देखा जाना चाहिए। खन्ना का तर्क है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और किसी व्यक्ति की निजी धार्मिक मान्यता के बीच अंतर समझना जरूरी है।
शर्मिला टैगोर की निजी पृष्ठभूमि का भी किया जिक्र
बहस के दौरान मुकेश खन्ना ने शर्मिला टैगोर की निजी पृष्ठभूमि और पटौदी परिवार में उनकी शादी का संदर्भ भी दिया। उन्होंने सवाल किया कि अगर किसी व्यक्ति की पारिवारिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग परंपराओं से जुड़ी रही है, तो उसे धार्मिक विविधता को समझने में दिक्कत क्यों होनी चाहिए।
खन्ना ने इसी संदर्भ में शर्मिला टैगोर को ‘आयशा बेगम’ कहकर संबोधित किया और उनकी शादी के बाद धार्मिक पहचान को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने बंगाल में शर्मिला टैगोर की परवरिश और वहां की सांस्कृतिक परंपराओं का भी उल्लेख किया।
‘ईश्वर एक हैं’, देवी-देवताओं को लेकर दिया तर्क
मुकेश खन्ना ने धार्मिक प्रतीकों को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हिंदू परंपरा में देवी-देवताओं की संख्या का उल्लेख होने का अर्थ यह नहीं है कि अलग-अलग भगवान हैं। उनके अनुसार, ईश्वर एक और निराकार हैं, जबकि भक्त उन्हें अलग-अलग रूपों में देखता है।
उन्होंने हनुमान, शिव, राम और कृष्ण जैसे धार्मिक प्रतीकों का उदाहरण देते हुए कहा कि आस्था में अलग-अलग रूपों के माध्यम से उसी ईश्वर की आराधना की जाती है।
‘सिर्फ खुदा के आगे सिर झुकाते हैं’ वाली दलील पर भी सवाल
खन्ना ने बहस के उस पहलू पर भी प्रतिक्रिया दी जिसमें कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि वे केवल खुदा के सामने सिर झुका सकते हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना और किसी विशेष धार्मिक उपासना पद्धति का पालन करना दो अलग-अलग बातें हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में लोग ‘भारत माता’ के सामने सिर झुकाते हैं और राष्ट्रीय भावनाओं को सम्मान देते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से सिर झुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
‘वंदे मातरम नहीं गाया जाना चाहिए’ वाली बात से असहमति
मुकेश खन्ना ने स्पष्ट किया कि किसी को मजबूर करना सही नहीं है, लेकिन ‘वंदे मातरम’ का विरोध करने या इसे गाया ही नहीं जाना चाहिए, ऐसी सोच से वह सहमत नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति सिर नहीं झुकाना चाहता तो उस पर जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए, लेकिन राष्ट्रगीत को ही अस्वीकार करने की बात उन्हें समझ में नहीं आती।
राजनीति को लेकर भी मुकेश खन्ना ने साधा निशाना
अपनी प्रतिक्रिया के अंत में मुकेश खन्ना ने इस बहस को राजनीति से भी जोड़ दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग किसी विशेष समुदाय को यह संदेश देने के लिए ऐसी बातें कर सकते हैं कि वे अब भी उनके साथ हैं और इसके पीछे वोट की राजनीति हो सकती है।
हालांकि, यह मुकेश खन्ना की राजनीतिक टिप्पणी और उनका व्यक्तिगत आकलन है। ‘वंदे मातरम’ को लेकर धार्मिक भावनाओं, राष्ट्रीय प्रतीकों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल अब भी सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।
