Nana Patekar 5 Life Unheard Facts: नाना पाटेकर के 5 अनसुने किस्से उनके सिद्धांतों को दर्शाते हैं। वे 'खलनायक' की पहली पसंद थे और अपनी चिता की लकड़ी पहले ही रख ली थी।

नाना पाटेकर के जाने के बाद उनकी जिंदगी के कई अनसुने किस्से एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। वो सिर्फ स्क्रीन पर दमदार किरदार निभाने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि असल जिंदगी में भी बेहद अनोखे इंसान थे। खलनायक के लिए पहली पसंद से लेकर अपनी अंतिम यात्रा की लकड़ी पहले से रखने तक, कार खरीदने के पैसे किसानों के लिए दान करने तक और करियर के चरम पर कारगिल जाने तक, नाना की जिंदगी कहानियों से भरी थी। संजय दत्त से नाराजगी भी उनके अंदर के उस सिद्धांत की कहानी है जो उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। जानें नाना पाटेकर की जिंदगी के 5 अनसुने किस्से।

खलनायक के लिए सबसे पहली पसंद थे नाना पाटेकर

सुभाष घई की खलनायक आज संजय दत्त की फिल्म के रूप में याद की जाती है, लेकिन शुरू में घई की पहली पसंद नाना पाटेकर ही थे। स्क्रिप्ट जब लिखी जा रही थी तो किरदार मिड ऐज का था और नाना उसमें फिट बैठते थे। नाना को कहानी पसंद भी आई। लेकिन जैसे-जैसे स्क्रिप्ट बदली और फिल्म कमर्शियल अंदाज में ढलने लगी, किरदार युवा और गुमराह लड़के वाला हो गया। तब घई की नजर संजय दत्त पर पड़ी। अगर नाना होते तो बल्लू का किरदार बिल्कुल अलग अंदाज में होता। उनकी एक्टिंग फिल्म को दूसरी दिशा दे सकती थी।

और पढ़ें - सबा अली खान को जब हुआ ब्रेन ट्यूमर, 27 की उम्र में इस दर्द से गुजरीं सैफ की बहन

अपने अंतिम संस्कार की लकड़ी पहले से रखी

नाना डार्क ह्यूमर के लिए जाने जाते थे और उन्होंने अपनी मौत पर भी उसी अंदाज में बात की। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्हें पता है अंतिम संस्कार के लिए बारह मन लकड़ी लगेगी। उन्होंने वही लकड़ी पहले से रख ली थी और वो सूखी रखी हुई थी। उन्होंने मजाक में कहा था कि गीली लकड़ी मत इस्तेमाल करना, वरना आंखों से पानी आएगा और मरते वक्त गलतफहमी हो जाएगी कि लोग उनके लिए रो रहे हैं। कम से कम मरते वक्त गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। ये बात उनके व्यावहारिक और बेबाक स्वभाव को दिखाती है।

कार खरीदने के पैसे किसानों के लिए किए दान

2015 में नाना ने डेढ़ करोड़ रुपये एक लग्जरी कार के लिए अलग रखे थे। टीवी पर सूखा प्रभावित महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या की खबर देखकर उनका मन बदल गया। उन्होंने मकरंद अनासपुरे को फोन किया और सुझाव दिया कि हर प्रभावित परिवार को पंद्रह हजार रुपये दिए जाएं। लेकिन परिवारों से मिलने के बाद महसूस हुआ कि एक बार का पैसा काफी नहीं है। उसी से एनएएएम फाउंडेशन की नींव पड़ी, जो विदर्भ और मराठवाड़ा के किसानों की मदद के लिए काम कर रहा है। कार की जगह उन्होंने सेवा का रास्ता चुना।

और पढ़ें - शाहरुख खान को जब नाना पाटेकर ने जेल से निकाला, शूटिंग के दौरान हुए थे गिरफ्तार

करियर के चरम पर की कारगिल में सेवा

प्रहार फिल्म के लिए नाना ने तीन साल तक मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ ट्रेनिंग ली थी। उस अनुभव ने उन्हें सेना के करीब ला दिया। 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो उन्होंने रक्षा मंत्री जॉज फर्नांडिस को पत्र लिखा और मोर्चे पर जाने की अनुमति मांगी। मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने करियर रोक दिया और क्विक रिएक्शन टीम में शामिल हो गए। साठ दिन श्रीनगर, द्रास और लेह में बिताए। जब गए तो वजन छिहत्तर किलो था, लौटे तो छप्पन किलो। बीस किलो वजन कम हो गया, लेकिन उन्होंने सेवा को प्राथमिकता दी।

बॉम्बे ब्लास्ट्स के बाद संजय दत्त से नाराजगी

1993 के बॉम्बे धमाकों में नाना के भाई की मौत हो गई थी। वो बेस्ट बस में सवार थे जिसमें बम रखा गया था। उनकी पत्नी भी उसी बस में जाने वाली थीं लेकिन रह गईं और बच गईं। इस नुकसान ने नाना के अंदर गहरी छाप छोड़ी। संजय दत्त उस समय केस से जुड़े होने की वजह से नाना ने साफ कह दिया था कि वो, उनके साथ काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि सरकार जो चाहे करे, लेकिन वो अपने हाथ में जो है वो करेंगे। ये व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस दिन मारे गए सभी लोगों के लिए है। बाईस साल तक उन्होंने ये स्टैंड रखा।

नाना की विरासत इन किस्सों में जिंदा

ये पांच किस्से बताते हैं कि नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि सिद्धांत के इंसान थे। रोल के लिए ट्रेनिंग लेना, युद्ध में जाना, किसानों के लिए पैसे लगाना और अपनी मौत पर भी मजाक करना—सब कुछ उनके स्वभाव का हिस्सा था। उनकी यादें फिल्मों से आगे जाकर इंसानियत और साहस की कहानी बन गई हैं। नाना की आत्मा को शांति मिले।