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चाणक्य नीति: जानिए सबसे बड़ा तप, सुख, रोग और धर्म कौन-सा है?

First Published Feb 5, 2021, 10:30 AM IST
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उज्जैन. आचार्य चाणक्य ने अपनी नीतियों में सफल और सुखी जीवन के कई सूत्र बताए हैं। इन सूत्रों का पालन अपने जीवन में करने से अनेक परेशानियों से बचा जा सकता है। आचार्य चाणक्य ने अपनी एक नीति में बताया है कि संसार में सबसे बड़ा तप, सुख, रोग और धर्म कौन-सा है। आज हम इसी सूत्र से जुड़ी खास बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार है…

1. शांति के बराबर दूसरा तप नहीं है
कुछ लोगों के पास दुनिया की सभी सुख-सुविधाएं होती हैं, लेकिन इसके बाद भी उनके मन में शांति का भाव नहीं होता। उनके मन में अशांति का भाव हमेशा बना रहता है। आचार्य चाणक्य के अनुसार जिस व्यक्ति के मन में शांति का भाव होता वही वास्तव तपस्वी कहलाते हैं।

1. शांति के बराबर दूसरा तप नहीं है
कुछ लोगों के पास दुनिया की सभी सुख-सुविधाएं होती हैं, लेकिन इसके बाद भी उनके मन में शांति का भाव नहीं होता। उनके मन में अशांति का भाव हमेशा बना रहता है। आचार्य चाणक्य के अनुसार जिस व्यक्ति के मन में शांति का भाव होता वही वास्तव तपस्वी कहलाते हैं।

2. संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है
कुछ लोग हमेशा दूसरे लोगों को देखकर ईर्ष्या करते हैं और उनके मन में असंतोष की भावना बनी रहती है। असंतोष की भावना दुख का कारण है। इसलिए आचार्य चाणक्य ने कहा है कि जो व्यक्ति संतोषी है यानी जो है उसी में खुश है, वास्तव में वही सुखी है।

2. संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है
कुछ लोग हमेशा दूसरे लोगों को देखकर ईर्ष्या करते हैं और उनके मन में असंतोष की भावना बनी रहती है। असंतोष की भावना दुख का कारण है। इसलिए आचार्य चाणक्य ने कहा है कि जो व्यक्ति संतोषी है यानी जो है उसी में खुश है, वास्तव में वही सुखी है।

3. लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है
जिसके मन में लालच है, ऐसा व्यक्ति लगातार दूसरे के धन पर नजर रखता है और मौका पाते ही उसे हड़पने की कोशिश करता है। उसकी यही भावना उसे मानसिक रूप से रोगी बना देती है। इसलिए आचार्य चाणक्य ने कहा है कि लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है।

 

3. लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है
जिसके मन में लालच है, ऐसा व्यक्ति लगातार दूसरे के धन पर नजर रखता है और मौका पाते ही उसे हड़पने की कोशिश करता है। उसकी यही भावना उसे मानसिक रूप से रोगी बना देती है। इसलिए आचार्य चाणक्य ने कहा है कि लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है।

 

4. दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है
मन में दया का भाव होना मनुष्य होने का प्रमाण है। इसलिए सभी धर्मों में दूसरे के प्रति दया भाव होने की बात कही गई है। जिस व्यक्ति के मन में दया नहीं होती, वह एक पशु के समान होता है। इसलिए आचार्य चाणक्य ने दया को ही सबसे बड़ा धर्म कहा है।

4. दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है
मन में दया का भाव होना मनुष्य होने का प्रमाण है। इसलिए सभी धर्मों में दूसरे के प्रति दया भाव होने की बात कही गई है। जिस व्यक्ति के मन में दया नहीं होती, वह एक पशु के समान होता है। इसलिए आचार्य चाणक्य ने दया को ही सबसे बड़ा धर्म कहा है।

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