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नर्मदा किनारे स्थित है ये ज्योतिर्लिंग, यहां दर्शन किए बिना अधूरे हैं सारे तीर्थ

First Published Feb 19, 2020, 6:41 PM IST
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उज्जैन. 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में ओंकारेश्वर का स्थान चौथा है। यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग को ममलेश्वर व अमलेश्वर भी कहते हैं। यह ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। नर्मदा क्षेत्र में ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। मान्यता के अनुसार यमुना में 15 दिन का स्नान तथा गंगा में 7 दिन का स्नान जो फल प्रदान करता है, उतना पुण्यफल नर्मदा के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

कैसे पहुंचे?

  • यहां से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा इंदौर में है। यहां से सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • इंदौर से खंडवा जाने वाली छोटी लाइन से ओंकारेश्वर जाने के लिए ओंकारेश्वर रोड नामक स्टेशन पर उतरें। वहां से ओंकारेश्वर के लिए आसानी से बसें व अन्य साधन मिल जाते हैं।
  • इंदौर से ओंकारेश्वर के लिए सीधी बसें भी आसानी से मिल जाती हैं। खंडवा से ओंकारेश्वर की दूरी लगभग 72 किमी है। खंडवा से भी ओंकारेश्वर के लिए बसें व टैक्सी मिलती हैं।

ये है ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा: शिवपुराण के अनुसार एक बार नारद मुनि पर्वतराज विंध्य के पास आए। नारद मुनि को आया देख विंध्य ने उनका आदरपूर्वक सत्कार व पूजन किया। विंध्य को इस बात का अभिमान था कि उसके उसे कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होती। उसके मन का भाव जानकर नारद मुनि ने कहा कि तुम्हारे यहां सबकुछ है, लेकिन मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊंचा है, उसके शिखर देवलोक में भी दिखाई देते हैं। नारद मुनि के ऐसा कहने पर विंध्य का अभिमान दूर हो गया और वह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगा। विंध्य की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब विंध्य ने भगवान शिव से कहा कि मेरी बुद्धि सदा आपके ध्यान में लगी रहे, ये वरदान दीजिए। भगवान शिव ने विंध्य को ये वरदान दे दिया। तभी वहां बहुत से देवता व ऋषि आए और उन्होंने महादेव से कहां कि आप यहां स्थिर रूप से निवास करें। भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थिर हो गए।

ये है ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा: शिवपुराण के अनुसार एक बार नारद मुनि पर्वतराज विंध्य के पास आए। नारद मुनि को आया देख विंध्य ने उनका आदरपूर्वक सत्कार व पूजन किया। विंध्य को इस बात का अभिमान था कि उसके उसे कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होती। उसके मन का भाव जानकर नारद मुनि ने कहा कि तुम्हारे यहां सबकुछ है, लेकिन मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊंचा है, उसके शिखर देवलोक में भी दिखाई देते हैं। नारद मुनि के ऐसा कहने पर विंध्य का अभिमान दूर हो गया और वह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगा। विंध्य की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब विंध्य ने भगवान शिव से कहा कि मेरी बुद्धि सदा आपके ध्यान में लगी रहे, ये वरदान दीजिए। भगवान शिव ने विंध्य को ये वरदान दे दिया। तभी वहां बहुत से देवता व ऋषि आए और उन्होंने महादेव से कहां कि आप यहां स्थिर रूप से निवास करें। भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थिर हो गए।

जिस पर्वत पर यह ज्योतिर्लिंग स्थापित है वहां ऊँ की आकृति दिखाई देती है। इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम ओंकारेश्वर है।

जिस पर्वत पर यह ज्योतिर्लिंग स्थापित है वहां ऊँ की आकृति दिखाई देती है। इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम ओंकारेश्वर है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार, यहां 68 तीर्थ स्थित हैं। यहां 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं।

धर्म ग्रंथों के अनुसार, यहां 68 तीर्थ स्थित हैं। यहां 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं।

कहते हैं कि पूर्व में देवी अहिल्याबाई होलकर की ओर से यहाँ रोज मिट्टी के 18 हजार शिवलिंग तैयार कर उनका पूजन करने के पश्चात नर्मदा में विसर्जित कर दिया जाता था।

कहते हैं कि पूर्व में देवी अहिल्याबाई होलकर की ओर से यहाँ रोज मिट्टी के 18 हजार शिवलिंग तैयार कर उनका पूजन करने के पश्चात नर्मदा में विसर्जित कर दिया जाता था।

मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के भले ही सारे तीर्थ कर ले, किन्तु जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहां नहीं चढ़ाता, उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं।

मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के भले ही सारे तीर्थ कर ले, किन्तु जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहां नहीं चढ़ाता, उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं।

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