मोदी सरकार ने एक महीने में चीन को दिए ये तीन झटके, बौखला उठा पड़ोसी देश
नई दिल्ली. एक तरफ पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संकट से जूझ रही है। वहीं, दूसरी ओर इस महामारी का असर अब देशों के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी दिखने लगा है। एक ओर अमेरिका चीन पर लगातार आरोप लगा रहा है और संबंध खत्म करने की मांग कर रहा है, वहीं, दूसरी ओर यूरोप के देश कोरोना वायरस फैलने में चीन की भूमिका की जांच कराने की मांग कर रहे हैं। उधर, एलएसी पर भी भारत और चीन के बीच तनातनी देखने को मिली है। इसी दौरान भारत ने भी चीन के खिलाफ कई बड़े कदम उठाए हैं।

1- एफडीआई नियमों में सख्ती
भारत ने पिछले 1 महीने में चीन को सीधे प्रभावित करने वाले कदम उठाए हैं। पहला कदम एफडीआई के नियमों में बदलाव के तौर पर उठाया। भारत ने अप्रैल में निवेश के ऑटोमैटिक रूट को बंद कर दिया है। अब भारत में चीनी निवेश से पहले सरकार की मंजूरी लेनी अनिवार्य हो गया है। दरअसल, भारत सरकार को आशंका थी कि महामारी के चलते भारतीय कंपनियों का कारोबार बंद पड़ा है। ऐसे में चीनी कंपनियां इसका फायदा उठा सकती थीं।
भारत के कदम के बाद चीन ने तुरंत नाराजगी जताई। चीन ने कहा, भारत का कदम एकतरफा और विश्व व्यापार संगठन के नियमों के खिलाफ है। इतना ही नहीं चीनी मीडिया ने कोरोना के वक्त में मेडिकल उपकरणों की सप्लाई भी बंद करने की धमकी दी।
चीनी सरकार के मुख्य पत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, मेडिकल सप्लाई के लिए भारत चीन पर निर्भर है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने की कोशिश संकट की घड़ी में मेडिकल सप्लाई के रास्ते में परेशानी बनेगी।
2- भारत चीन को चुनौती देने के लिए तैयार
कोरोना के बीच तमाम कंपनियां चीन से बाहर आना चाहती हैं। तमाम मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि ये कंपनियां भारत में आना चाहती हैं। इस पर चीन ने कहा था कि भारत चीन की जगह लेने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह सफल नहीं होगा। दरअसल, चीन की चिंता इसलिए बढ़ गई, क्यों कि जर्मनी की एक जूता कंपनी ने चीन ने व्यापार समेटकर उत्तर प्रदेश में प्लांट शिफ्ट करने का ऐलान किया है।
ग्लोबल टाइम्स ने जर्मनी की कंपनी शिफ्ट होने की खबरों पर लिखा था, उत्तर प्रदेश ने चीन से कंपनियों को अपने यहां शिफ्ट कराने की योजना बनाने के लिए एक टास्क फोर्स बनाया है। हालांकि, इन प्रयासों के बाद भी भारत चीन की जगह लेगा, इसकी उम्मीद कम ही है।
3- कोरोना वायरस की जांच को समर्थन
हाल ही में WHO की सालाना बैठक हुई थी। इसमें भारत समेत दुनिया के तमाम देशों ने चीन के खिलाफ जांच की मांग की। इससे पहले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि कोरोना वायरस प्राकृतिक नहीं है यह किसी लैब में पैदा हुआ था।
इससे पहले ऑस्ट्रेलिया, यूरोप की ओर से जांच की मांग उठ रही थी। भारत ने पहली बार इस जांच में औपचारिक रूप से हामी भरी। हालांकि, इस मांग में चीन का सीधे तौर पर नाम नहीं था।
ताइवान को लेकर भी दिया संकेत: चीन ताइवान को लेकर कूटनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। चीन ताइवान को एक देश दो सिस्टम के तौर पर देखता है। जबकि ताइवान खुद को स्वतंत्र बताता है। अभी तक भारत इस मामले में चीन के पक्ष में दिखा है और अब तक ताइवान के साथ कोई राजनयिक संबंध भी स्थापित नहीं कराए हैं। लेकिन भारत ने अब इस नीति में बदलाव के संकेत दे दिए हैं। भारत पिछले हफ्ते ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन के शपथ ग्रहण में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुआ। भाजपा की ओर शामिल दो सांसद उन 41 देशों के प्रतिनिधियों में थे, जिन्होंने राष्ट्रपति को बधाई दी।
चीन की बढ़ी चिंता
ताइवान की राष्ट्रपति साई-इंग वेन लगातार चीन की वन नेशन टू सिस्टम पॉलिसी का विरोध करती आई हैं। ऐसे में चीन उन देशों का लगातार विरोध करता है, जो ताइवान का समर्थन करते हैं। पिछले हफ्ते जब अमेरिका के विदेश मंत्री ने ताइवान की राष्ट्रपति को बधाई दी तो चीन ने अमेरिका तक को अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली। ऐसे में मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पर चीन की चिंता बढ़ी होगी।
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