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यह कैसी सरकार..6 दिनों तक पैदल चलती रही 9 माह की गर्भवती, 200 किमी बाद आई किसी को सुध
डूंगरपुर, राजस्थान. यह तस्वीर लॉकडाउन के बीच सरकारी इंतजामों की पोल खोलती है। काम-धंधा बंद होने के बाद एक परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई। घर जाने के लिए न तो पैसा था और न ही साधन। लिहाजा, यह फैमिली पैदल ही अपने घर को निकल पड़ी। महिला को मालूम था कि वो 9 महीने की गर्भवती है, लेकिन वो बेबस थी। उसके साथ 2 साल की लड़की और 1 साल का लड़का भी था। पति ने रास्तेभर कइयों से मदद मांगी। कई जगह पुलिस और प्रशासन के अफसरों से सामना हुआ, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। गनीमत रही कि डूंगपुर में यानी 200 किमी का सफर करने के बाद एक चौकी पर पुलिसवालों को इन पर दया आई। यहां उन्हें खाना खिलाया गया और फिर एम्बुलेंस की व्यवस्था करके उन्हें घर पहुंचा गया।

यह दम्पती 6 दिन पहले अहमदाबाद से मप्र के रतलाम जिले के सैलाना के गांव कूपडा गांव के लिए निकले थे। डूंगरपुर के टामटिया पहुंचने पर इन्हें चौकी से मदद मिली। लक्ष्मण भाभर ने बताया कि उनकी पत्नी से एक इंच भी चलना संभव नहीं हो पा रहा था। टामटिया चौकी पर इनकी स्क्रीनिंग की गई और फिर खिला-पिलाकर एम्बुलेंस से आगे रवाना किया गया। आगे पढ़िये रिक्शे पर हजारों किमी का सफर...
देवघर, झारखंड. यह हैं मैकेनिक गणेश मंडल। मूलत: पश्चिम बंगाल के रहने वाले गणेश दिल्ली में काम करते थे। काम-धंधा बंद हुआ, तो भूखों मरने की नौबत आ गई। लिहाजा, उन्होंने 5000 रुपए में पुराना रिक्शा खरीदा और अपने घर को निकल पड़े। रिक्शे पर उनकी पत्नी और साढ़े तीन साल की बच्ची बैठी थी। करीब 1350 किमी रिक्शा खींचकर वे देवघर पहुंचे, तो यहां कम्यूनिटी किचन में सबने खाना खाया। इसके बाद आगे निकल गए। रास्ते में एक जगह रिक्शा पंचर हो गया। पंचर सुधारने वाले ने उनसे 140 रुपए वसूल लिए। इतनी परेशानी के बावजूद गणेश के चेहरे पर संतोष था कि अब वे घर के नजदीक हैं। उन्होंने कहा कि अब वे दिल्ली नहीं लौटेंगे। आगे देखिए लॉकडाउन में फंसे लोगों की पीड़ा दिखातीं तस्वीरें
यह तस्वीर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की है। ट्रेन का टिकट न मिलने पर रो पड़ी महिला।
नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन के बाहर खड़ी गर्भवती महिला। यह अपने घर को निकली थी।
नई दिल्ली के रेलवे स्टेशन के बाहर ट्रेन के इंतजार में अपने बच्चों के साथ बैठी मां।
यह तस्वीर पटना की है। मजदूर परिवार को बच्चों के साथ ऐसे घरों को जाना पड़ रहा है।
मीलों पैदल चलकर अपने घरों की ओर जा रहे हैं मजदूर।
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