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21 अप्रैल से पहले करें ये आसान उपाय, दूर हो सकती हैं आपकी परेशानियां और पैसों की तंगी

First Published Apr 19, 2021, 12:10 PM IST
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उज्जैन. इस बार 21 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि का समापन हो जाएगा। चैत्र नवरात्रि में ज्योतिषीय उपाय करने का विशेष महत्व है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस दौरान किए गए उपायों से बहुत ही जल्दी शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आज हम आपको कुछ आसान उपाय बता रहे हैं जो आप नवरात्रि में कर सकते हैं। ये उपाय इस प्रकार हैं…

1. चैत्र नवरात्रि में पान के पत्ते पर गुलाब की सात पंखुड़िया रखें और महालक्ष्मी मन्त्र पढ़ते हुये वो पान देवी मां को चढ़ा दें। इससे आपकी परेशानियां कम हो सकती हैं।
 

1. चैत्र नवरात्रि में पान के पत्ते पर गुलाब की सात पंखुड़िया रखें और महालक्ष्मी मन्त्र पढ़ते हुये वो पान देवी मां को चढ़ा दें। इससे आपकी परेशानियां कम हो सकती हैं।
 

2. गुलाब के फूल में कपूर रखकर देवी दुर्गा के सामने रखे। फिर माता महालक्ष्मी के मन्त्र का 6 माला जाप करें। शाम को फूल में से कपूर लेकर जला दें।
 

2. गुलाब के फूल में कपूर रखकर देवी दुर्गा के सामने रखे। फिर माता महालक्ष्मी के मन्त्र का 6 माला जाप करें। शाम को फूल में से कपूर लेकर जला दें।
 

3. नवरात्रि में धन लाभ के लिए नीचे लिखे मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
 

3. नवरात्रि में धन लाभ के लिए नीचे लिखे मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
 

4. चैत्र नवरात्रि में इमली के पेड़ की डाल काट कर घर में ले आयें। इस डाल को सामने रखकर महालक्ष्मी मंत्र का जाप 11 बार करें और फिर इसे अपने तिजोरी या धन रखने की स्थान पर रख दें। इससे अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति होगी।
 

4. चैत्र नवरात्रि में इमली के पेड़ की डाल काट कर घर में ले आयें। इस डाल को सामने रखकर महालक्ष्मी मंत्र का जाप 11 बार करें और फिर इसे अपने तिजोरी या धन रखने की स्थान पर रख दें। इससे अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति होगी।
 

5. नवरात्रि के दौरान नीचे लिखे मंत्र के जाप से आप जीवन की समस्यायों से छुटकारा पा सकते हैं।
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनी।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
 

5. नवरात्रि के दौरान नीचे लिखे मंत्र के जाप से आप जीवन की समस्यायों से छुटकारा पा सकते हैं।
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनी।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

 

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