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स्वर्ग की अप्सरा को हुआ था इस राजा से प्यार, बहुत रोचक है देश के इस अनोखे उल्टे किले की कहानी

First Published Feb 4, 2020, 10:57 AM IST
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प्रयागराज में इन दिनों  माघ मेला चल रहा है। दूर-दूर से लोग माघ मेले में आकर संगम स्नान कर रहे हैं। गंगा स्नान के आलावा लोग यहां के प्रमुख स्थानों पर भी दर्शन व पूजन के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे ही एक स्थान गंगा नदी के बिलकुल किनारे पर स्थित उल्टा किला है। कहा जाता है कि यह किला राजा चन्द्रमा के पौत्र पुरुरवा का है। 

प्रयागराज में इन दिनों  माघ मेला चल रहा है। दूर-दूर से लोग माघ मेले में आकर संगम स्नान कर रहे हैं। गंगा स्नान के आलावा लोग यहां के प्रमुख स्थानों पर भी दर्शन व पूजन के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे ही एक स्थान गंगा नदी के बिलकुल किनारे पर स्थित उल्टा किला है। कहा जाता है कि यह किला राजा चन्द्रमा के पौत्र पुरुरवा का है। राजा पुरुरवा के बारे में इतिहास में इतिहास व धर्मग्रंथों में एक बहुत ही चर्चित कहानी प्रसिद्ध है। वह है उनकी और स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी की प्रेम कहानी।  उर्वशी राजा पुरुरवा की प्रसिद्धि सुनकर उन्हें देखने आई तो मंत्रमुग्ध होकर उनसे प्यार कर बैठी। बाद में दोनों ने शादी कर लिया।

प्रयागराज में इन दिनों माघ मेला चल रहा है। दूर-दूर से लोग माघ मेले में आकर संगम स्नान कर रहे हैं। गंगा स्नान के आलावा लोग यहां के प्रमुख स्थानों पर भी दर्शन व पूजन के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे ही एक स्थान गंगा नदी के बिलकुल किनारे पर स्थित उल्टा किला है। कहा जाता है कि यह किला राजा चन्द्रमा के पौत्र पुरुरवा का है। राजा पुरुरवा के बारे में इतिहास में इतिहास व धर्मग्रंथों में एक बहुत ही चर्चित कहानी प्रसिद्ध है। वह है उनकी और स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी की प्रेम कहानी। उर्वशी राजा पुरुरवा की प्रसिद्धि सुनकर उन्हें देखने आई तो मंत्रमुग्ध होकर उनसे प्यार कर बैठी। बाद में दोनों ने शादी कर लिया।

कहा जाता है कि उर्वशी देवराज इंद्र की सबसे प्रिय अप्सरा थीं। राजा पुरुरवा से विवाह के बाद उर्वशी उनके साथ पृथ्वी लोक पर गंगा किनारे इसी किले में रहने लगीं। जिसके बाद देवराज इंद्र ने उन दोनों को अलग करने के लिए तरकीब सोचना शुरू कर दिया। उन्होंने इसके लिए गन्धर्वो को भेजा। जिसके बाद गंधर्वों ने छल करके राजा पुरुरवा से उर्वशी को दिया गया वचन तुड़वा दिया। जिसके बाद उर्वशी फिर से स्वर्ग लोक वापस चली गई।

कहा जाता है कि उर्वशी देवराज इंद्र की सबसे प्रिय अप्सरा थीं। राजा पुरुरवा से विवाह के बाद उर्वशी उनके साथ पृथ्वी लोक पर गंगा किनारे इसी किले में रहने लगीं। जिसके बाद देवराज इंद्र ने उन दोनों को अलग करने के लिए तरकीब सोचना शुरू कर दिया। उन्होंने इसके लिए गन्धर्वो को भेजा। जिसके बाद गंधर्वों ने छल करके राजा पुरुरवा से उर्वशी को दिया गया वचन तुड़वा दिया। जिसके बाद उर्वशी फिर से स्वर्ग लोक वापस चली गई।

इस किले के बारे के बारे में कहा जाता है कि यहां किसी जमाने में राजा हरिबोंग हुए थे। जिन्होंने एक संत को अपने किले में भोजन पर आमंत्रित किया था। लेकिन राजा ने अपने किले में बुलाकार उस संत का अपमान किया। जिसके बाद संत ने राजा की श्राप दे दिया। संत के श्राप देते ही किले में आग लग गई और सारी चीजें उल्टी सीधी हो गई। तभी से इन किले को उल्टा किला कहा जाता है।

इस किले के बारे के बारे में कहा जाता है कि यहां किसी जमाने में राजा हरिबोंग हुए थे। जिन्होंने एक संत को अपने किले में भोजन पर आमंत्रित किया था। लेकिन राजा ने अपने किले में बुलाकार उस संत का अपमान किया। जिसके बाद संत ने राजा की श्राप दे दिया। संत के श्राप देते ही किले में आग लग गई और सारी चीजें उल्टी सीधी हो गई। तभी से इन किले को उल्टा किला कहा जाता है।

किले मे तकरीबन 30 फिट गहरी एक गुफा है। गुफा के भीतर जाने के लिए एक संकरी सीढ़ी अंदर जाती है। अंदर जाने के बाद उस गुफा में हनुमान जी की एक बेहद पुरानी मूर्ति है। जहां लोग रोजाना पूजा अर्चना के लिए जाते हैं। इस मंदिर के अगल बगल 11 गुफाएं और हैं। जिनमे काफी अँधेरा रहता है। इन गुफाओं में चमगादड़ों की भरमार है।

किले मे तकरीबन 30 फिट गहरी एक गुफा है। गुफा के भीतर जाने के लिए एक संकरी सीढ़ी अंदर जाती है। अंदर जाने के बाद उस गुफा में हनुमान जी की एक बेहद पुरानी मूर्ति है। जहां लोग रोजाना पूजा अर्चना के लिए जाते हैं। इस मंदिर के अगल बगल 11 गुफाएं और हैं। जिनमे काफी अँधेरा रहता है। इन गुफाओं में चमगादड़ों की भरमार है।

गंगा तट से लगभग 150 फिट की ऊंचाई पर स्थित ये किला लोगों के आकर्षण का केंद्र है। हांलाकि अब किले के अवशेष के नाम पर केवल कुछ खंडहर और और टीला ही बचा है। लेकिन इसके बावजूद भी ये जगह लोगों की आस्था का केंद्र है।

गंगा तट से लगभग 150 फिट की ऊंचाई पर स्थित ये किला लोगों के आकर्षण का केंद्र है। हांलाकि अब किले के अवशेष के नाम पर केवल कुछ खंडहर और और टीला ही बचा है। लेकिन इसके बावजूद भी ये जगह लोगों की आस्था का केंद्र है।

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