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कोरोना के बाद चीन में फैली एक और महामारी, जंगली चूहे बने आफत का सबब, लगाना पड़ा आपातकाल

First Published Oct 1, 2020, 1:21 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना महामारी की शुरुआत करने वाला चीन अब दावा करता है कि वो कोरोना से उबर चुका है। लेकिन, अब वहां से खबर आ रही है कि चीन में दूसरी महामारी फैल गई है। इस महामारी का नाम ब्यूबोनिक प्लेग है। खबरों की मानें तो चीन के यून्नान प्रांत में मेंघाई काउंटी का रहनेवाला एक तीन साल का बच्चा प्लेग की चपेट में आ गया है।

पिछले हफ्ते ही वहां प्लेग फैलने की खबर आई थी, लेकिन रविवार को इसकी पुष्टि हुई है। अब चीन के दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से में आपातकाल लगा दिया गया है। इससे पहले यून्नान में प्लेग से संक्रमित तीन चूहे भी मरे हुए मिले थे। खबरों की मानें तो बच्चे की हालत फिलहाल स्थिर है, लेकिन यह महामारी विकराल रूप न ले, इसके लिए चीनी प्रशासन ने चौथे स्तर का आपातकाल घोषित कर दिया है।
 

पिछले हफ्ते ही वहां प्लेग फैलने की खबर आई थी, लेकिन रविवार को इसकी पुष्टि हुई है। अब चीन के दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से में आपातकाल लगा दिया गया है। इससे पहले यून्नान में प्लेग से संक्रमित तीन चूहे भी मरे हुए मिले थे। खबरों की मानें तो बच्चे की हालत फिलहाल स्थिर है, लेकिन यह महामारी विकराल रूप न ले, इसके लिए चीनी प्रशासन ने चौथे स्तर का आपातकाल घोषित कर दिया है।
 

मीडिया रिपोर्ट्स में चीन के सरकारी अखबार के मुताबिक कहा जा रहा है कि मेंघाई के शिडिंग गांव में चूहों में बीमारी के प्रसार की सूचना जारी गई हैष दो महीने पहले उत्तरी मंगोलिया में भी प्लेग के कई मामले सामने आए थे, जिसके बाद देशभर में तीसरे स्तर की चेतावनी जारी कर दी थी। मंगोलिया में प्लेग के 22 संदिग्ध मामले सामने आए थे, जिनमें से 6 की पुष्टि हुई थी।
 

मीडिया रिपोर्ट्स में चीन के सरकारी अखबार के मुताबिक कहा जा रहा है कि मेंघाई के शिडिंग गांव में चूहों में बीमारी के प्रसार की सूचना जारी गई हैष दो महीने पहले उत्तरी मंगोलिया में भी प्लेग के कई मामले सामने आए थे, जिसके बाद देशभर में तीसरे स्तर की चेतावनी जारी कर दी थी। मंगोलिया में प्लेग के 22 संदिग्ध मामले सामने आए थे, जिनमें से 6 की पुष्टि हुई थी।
 

गौरतलब है कि जुलाई में खोव्द प्रांत में ब्यूबोनिक प्लेग के दो अन्य मामले दर्ज किए गए थे, जिसके बाद 140 से ज्यादा लोगों की जांच की गई थी। उस समय आई खबरों की मानें तो एक चरवाहा चीन के उत्तरी आंतरिक मंगोलिया क्षेत्र में इस बीमारी के संपर्क में आ गया था। इसके बाद प्रशासन ने स्थानीय स्तर पर जानवरों का शिकार नहीं करने और उनका मांस नहीं खाने की अपील की थी। 
 

गौरतलब है कि जुलाई में खोव्द प्रांत में ब्यूबोनिक प्लेग के दो अन्य मामले दर्ज किए गए थे, जिसके बाद 140 से ज्यादा लोगों की जांच की गई थी। उस समय आई खबरों की मानें तो एक चरवाहा चीन के उत्तरी आंतरिक मंगोलिया क्षेत्र में इस बीमारी के संपर्क में आ गया था। इसके बाद प्रशासन ने स्थानीय स्तर पर जानवरों का शिकार नहीं करने और उनका मांस नहीं खाने की अपील की थी। 
 

ब्यूबोनिक प्लेग को 'ब्लैक डेथ' यानी काली मौत भी कहा जाता है। यह बहुत पुरानी महामारी है। इसकी वजह से करोड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। यह महामारी अब तक तीन बार व्यापक स्तर पर लोगों को अपना शिकार बना चुकी है। इसकी चपेट में आने से पहली बार लगभग 5 करोड़ लोग, दूसरी बार यूरोप की एक तिहाई आबादी और तीसरी बार लगभग 80 हजार लोगों की मौत हो चुकी है।

ब्यूबोनिक प्लेग को 'ब्लैक डेथ' यानी काली मौत भी कहा जाता है। यह बहुत पुरानी महामारी है। इसकी वजह से करोड़ों लोगों की मौत हो चुकी है। यह महामारी अब तक तीन बार व्यापक स्तर पर लोगों को अपना शिकार बना चुकी है। इसकी चपेट में आने से पहली बार लगभग 5 करोड़ लोग, दूसरी बार यूरोप की एक तिहाई आबादी और तीसरी बार लगभग 80 हजार लोगों की मौत हो चुकी है।

कैसे होती है यह बीमारी?

विशेषज्ञों के मुताबिक मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जाता है कि यह बीमारी जंगली चूहों में पाए जाने वाली बैक्टीरिया से होती है। बीमारी जंगली चूहों को होती है और फिर उसके मरने के बाद प्लेग के बैक्टीरिया पिस्सुओं के जरिए मानव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इन पिस्सुओं के काटने पर संक्रमण वाले बैक्टीरिया व्यक्ति के ब्लड में मिल जाते हैं और व्यक्ति प्लेग से संक्रमित हो जाता है।

कैसे होती है यह बीमारी?

विशेषज्ञों के मुताबिक मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जाता है कि यह बीमारी जंगली चूहों में पाए जाने वाली बैक्टीरिया से होती है। बीमारी जंगली चूहों को होती है और फिर उसके मरने के बाद प्लेग के बैक्टीरिया पिस्सुओं के जरिए मानव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इन पिस्सुओं के काटने पर संक्रमण वाले बैक्टीरिया व्यक्ति के ब्लड में मिल जाते हैं और व्यक्ति प्लेग से संक्रमित हो जाता है।

ब्यूबोनिक प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरियम है। यह शरीर के लिंफ नोड्स (लसीका ग्रंथियां), खून और फेफड़ों पर हमला करता है। वैसे तो यह पुरानी महामारी है, लेकिन आज भी इसके मामले सामने आते रहते हैं, जैसा कि अभी चीन और मंगोलिया में हुआ। साल 1994 में भारत में भी ब्यूबोनिक प्लेग के करीब 700 मामले सामने आए थे, इनमें से 52 लोगों की मौत हो गई थी।

ब्यूबोनिक प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरियम है। यह शरीर के लिंफ नोड्स (लसीका ग्रंथियां), खून और फेफड़ों पर हमला करता है। वैसे तो यह पुरानी महामारी है, लेकिन आज भी इसके मामले सामने आते रहते हैं, जैसा कि अभी चीन और मंगोलिया में हुआ। साल 1994 में भारत में भी ब्यूबोनिक प्लेग के करीब 700 मामले सामने आए थे, इनमें से 52 लोगों की मौत हो गई थी।

ब्यूबोनिक प्लेग के लक्षण की बात की जाए तो इसमें व्यक्ति को तेज बुखार और शरीर में असहनीय दर्द होता है। नाड़ी तेज चलने लगती है। नाक और उंगलियां भी काली पड़ने लगती हैं और सड़ने लगती हैं। दो-तीन दिन में शरीर में गिल्टियां निकलने लगती हैं, जो 14 दिन में पक जाती हैं। गिल्टियां निकलने की वजह से इस बीमारी को गिल्टीवाला प्लेग भी कहते हैं।

ब्यूबोनिक प्लेग के लक्षण की बात की जाए तो इसमें व्यक्ति को तेज बुखार और शरीर में असहनीय दर्द होता है। नाड़ी तेज चलने लगती है। नाक और उंगलियां भी काली पड़ने लगती हैं और सड़ने लगती हैं। दो-तीन दिन में शरीर में गिल्टियां निकलने लगती हैं, जो 14 दिन में पक जाती हैं। गिल्टियां निकलने की वजह से इस बीमारी को गिल्टीवाला प्लेग भी कहते हैं।

बताया जाता है कि कि छठी और आठवीं शताब्दी में इस बीमारी को 'प्लेग ऑफ जस्टिनियन' नाम से जाना जाता था। तब करीब ढाई से 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद साल 1347 में जब ब्यूबोनिक प्लेग से यूरोप की एक तिहाई आबादी की मौत हो गई थी तो इसे 'ब्लैक डेथ' नाम दिया गया था। प्लेग की वैक्सीन बनाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं, लेकिन अबतक इसकी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पाई है।
 

बताया जाता है कि कि छठी और आठवीं शताब्दी में इस बीमारी को 'प्लेग ऑफ जस्टिनियन' नाम से जाना जाता था। तब करीब ढाई से 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद साल 1347 में जब ब्यूबोनिक प्लेग से यूरोप की एक तिहाई आबादी की मौत हो गई थी तो इसे 'ब्लैक डेथ' नाम दिया गया था। प्लेग की वैक्सीन बनाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं, लेकिन अबतक इसकी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पाई है।
 

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