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क्या रसोई में मंदिर बनाना सही है? क्या किचन में भगवान की मूर्तियां रखना चाहिए? दूर करें सबसे बड़ा कन्फ्यूजन
Temple in Kitchen: आज के समय में छोटे मकानों का चलन बहुत तेजी से चल रहा है। ऐसे में बहुत से लोग किचन में ही छोटा सा मंदिर बना लेते हैं। इसे लेकर विद्वनों की अलग-अलग राय है।

जानें किचन में मंदिर से जुड़ी जरूरी बातें
Kitchen Temple Vastu: आजकल शहरों में छोटे फ्लैट और कम जगह वाले घरों का चलन बढ़ गया है। ऐसे में कई लोग सोचते हैं अगर अलग से पूजा घर बनाने की जगह नहीं है, तो क्या किचन में मंदिर बना सकते हैं? इस सवाल को लेकर अक्सर कन्फ्यूजन रहता है। कुछ लोग इसे सही मानते हैं, जबकि कुछ इसे गलत बताते हैं। धर्म और वास्तु शास्त्र इस बारे में क्या कहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा का स्थान हमेशा साफ, शांत और सम्मानजनक होना चाहिए। अगर घर में अलग से पूजा रूम बन सकता है, तो उसे सबसे अच्छा ऑप्शन माना जाता है। लेकिन अगर घर छोटा है और अलग कमरा या कोना उपलब्ध नहीं है, तो कई रसोई में साफ और ऊंची जगह पर छोटा मंदिर बनाया जा सकता है।

क्यों कहा जाता है कि रसोई में मंदिर बनाने से बचना चाहिए?
रसोई में हर समय खाना बनता है। वहां तेल, मसाले, धुआं, भाप और बर्तनों की आवाज रहती है। कुछ फेमली में प्याज, लहसुन, अंडा या मांसाहारी भोजन भी रसोई में बनाया जाता है। ऐसे माहौल को पूजा के लिए सही नहीं माना जाता। इस वजह से वास्तु और धार्मिक परंपराओं में पूजा घर रसोई से अलग बनाने की सलाह दी गई है।
अगर मजबूरी हो तो क्या करें?
मान लीजिए किसी परिवार के पास सिर्फ एक कमरा और एक छोटा किचन है। ऐसे में अलग मंदिर बनाना पॉसिबल नहीं है। ऐसी कंडीशन में किचन के उत्तर-पूर्व (ईशान) दिशा या किसी साफ और ऊंचे शेल्फ पर छोटा मंदिर बनाया जा सकता है। लेकिन ध्यान रखना होगा कि मंदिर गैस चूल्हे, सिंक या कूड़ेदान के पास ना हो।
किचन में अगर मंदिर रखना है तो किन बातों का रखें ध्यान?
- मंदिर को गैस स्टोव के ठीक ऊपर या सामने ना रखें।
- सिंक या गंदे बर्तनों के पास भगवान की मूर्तियां ना रखें।
- कूड़ेदान से मंदिर को दूर रखें।
- पूजा का स्थान रोज साफ करें।
- अगर संभव हो तो खाना बनाते समय मंदिर को धुएं और तेल की छींटों से बचाएं।
- बहुत बड़ी या भारी मूर्तियों की जगह छोटी प्रतिमाएं रखें।
वास्तु शास्त्र क्या कहता है?
वास्तु शास्त्र में पूजा घर के लिए ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) को सबसे शुभ माना गया है। वहीं रसोई के लिए सामान्य तौर पर आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) को उपयुक्त बताया जाता है। इसलिए वास्तु दोनों स्थान अलग-अलग हों तो बेहतर है।
कॉन्टेन्ट सोर्सः Manasara (भारतीय स्थापत्य और स्थान विन्यास से जुड़े सिद्धांत), Mayamata (पूजा स्थल और गृह विन्यास संबंधी पारंपरिक सिद्धांत), वास्तु एक्सपर्ट और धर्माचार्यों द्वारा दी जाने वाली सलाह।