Bihar Sujani Embroidery: चिकनकारी, फुलकारी से हटकर जानिए, बिहार की प्रसिद्ध सुजनी कढ़ाई का इतिहास, इसकी खासियत। GI Tag,डिजाइन, बनाने की तकनीक और क्यों यह दुनियाभर में लोकप्रिय हो रही है।
जब बात भारत की पारंपरिक कढ़ाइयों की आती है तो ज्यादातर लोगों के दिमाग में चिकनकारी, फुलकारी, कच्छ एंब्रॉयडरी का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन विश्व में बिहार की सुजनी कढ़ाई भी धूम मचा रही है। यह ऐसी अनोखी लोककला है, जो केवल सिर्फ कपड़ों को सजाने का तरीका नहीं बल्कि महिलाओं की भावनाओं, संघर्षों और उनकी कहानियों को बयां करती है। यही वजह है कि आज यह कला भारत नहीं बल्कि दुनियाभर में अलग पहचान बना रही है।
सुजनी कढ़ाई क्यों पसिद्ध है?
सुजनी कढ़ाई की शुरुआत बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के भुसरा गांव से गांव से मानी जाती है। यहां पर पहले ग्रामीण महिलाएं, पुराने सूती कपड़ों, साड़ियों, धोतियों की तीन-चार परतें बनाकर बच्चों के लिए रजाई-कंबल तैयार करती थीं। धीरे-धीरे इनपर हाथ से सुंदर कढ़ाई की जाने लगी और यह परंपरा आगे चलकर सुजनी एंब्रॉयडरी के रूप में जानी जाने लगी।
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सुजनी कढ़ाई की खासियत
इस एंब्रॉयडरी की खासियत उसकी कहानी है, जो सिर्फ कला नहीं बल्कि सपनों को फैब्रिक पर उकेरती हैं। इसमें फूल पत्तियां, गांव का जीवन, खेती, पशु-पक्षी, देवी-देवता, महिलाओं के दैनिक जीवन को धागों के जरिए उकेरा जाता है। तकनीक की बात करें तो इसमें मुख्य रूप से रनिंग स्टिच और चेन स्टिच का इस्तेमाल होता है। यानी पहले पूरे कपड़े पर महीन टांके लगाएं जाते हैं बल्कि अलग-अलग धागों से डिजाइन तैयार किए जाते हैं। इस कढ़ाई में लाल, पीला, हरा, नीला और काले रंग के धागों का यूज सबसे ज्यादा किया जाता है।
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धूम मचा रही सुजनी एंबॉयडरी
समय के साथ सुजनी कढ़ाई केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रह गई है। यह मॉडर्न फैशन में भी अपनी जगह बना चुकी है, रजाइयों-साड़ियों से हटकर कुर्ती, स्टोल, बैंग, वॉल हैंगिंग और होम डेकोर प्रोडक्ट्स में भी इसकी झलक देखने को मिलती है। इस कला को 2006 में GA Tag से नवाजा गया। इतना ही नहीं, बारीक कारीगरी और बेहतरीन स्टोरीटेलिंग कारण यह कढ़ाई Seal of Excellence प्राप्त कर चुकी है।
