Kalamkari Embroidery History: जानिए देश की प्रसिद्ध कला कलमकारी के बारे में, यह किस राज्य की शान है, कैसे बनाई जाती है और कैसे कलमकारी फैब्रक की पहचान करें।
भारतीय हस्तकला में ऐसी कढ़ाई हैं जो केवल देश नहीं बल्कि विदेशों में अपनी पहचान बना चुकी है। उत्तर प्रदेश की चिकनकारी, बिहार की सुजनी या फिर मध्य प्रदेश की बंजारा कढ़ाई हो, इसके बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से आंध्र प्रदेश से निकली कलमकारी एंब्रॉयडरी की डिमांड बढ़ गई है। बारीक डिजाइन, हाथों की कई बारीक पेटिंग का अनोखा मेल सदियों बाद फिर से लोगों को भा रहा है, आइए जानते हैं इस एंब्रॉयडरी के बारे में विस्तार से और खासियत।
कलमकारी कला क्या है?
कलमकारी शब्द फारसी भाषा के दो शब्दों कलम यानी पेन और कारी मतलब कारीगरी से मिल कर बना है। यह कला कपड़े पर बांस खजूर की लकड़ी से बनी खास कलम की मदद से हाथों से चित्र बनाकर उकेरी जाती है। इन चित्रों में प्राकृति से जुड़े तत्व, पशु-पक्षी, फूल पत्ती और पारंपरिक डिजाइनों का इस्तेमाल ज्यादा होता है।
कलमकारी कला का इतिहास
कहा जाता है कलमकारी कला की जड़ें सिंधु घांटी सभ्यता तक पहुंचती है। पहले इस कला का इस्तेमाल मंदिरों में धार्मिक लोगों के लिए कपड़े बनाने के लिए किया जाता था। समय के साथ यह कला दक्षिण भारत से निकलर शाही दरबारों और फिर इंटरनेशनल मार्केट तक पहुंच गई। आज आलम यह है कि इसे भारत की सबसे प्रतिष्ठित और पारंपरिक टेक्सटाइल कलाओं में गिना जाता है।
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कलमकारी कढ़ाई की कितनी शैलियां हैं ?
कलमकारी कढ़ाई को तीन प्रमुख शैलियों में बांटा गया है-
श्रीकालहस्ती कलमकारी- यह पूरी तरह से हाथों से बनाई जाता है। इसमें किसी ब्लॉक के बिना सीधे कपड़ों पर चित्र उकेरे जाते हैं। इस शैली में धार्मिक कथाएं और देवी-देवता के चित्र प्रमुख है।
मछलीपट्नम कलमकारी- इस शैली में लकड़ी के हाथ से बने ब्लॉको की मदद से प्रिटिंग की जाती है। इसमें फूल-पत्तियां, बेल-बूटे, पक्षी और फारसी डिजाइन ज्यादा देखने को मिलती है।
करुप्पर कलमकारी- इस शैली में हाथ की पेंटिंग के साथ सोने के धागों का बेहद महीन काम मिलता है।
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कलमकारी डिजाइन कितने चरणों में तैयार होती है?
कलमकारी कपड़ा बनाना आसान नहीं है। इसे तैयार करने में 15-20 दिनों का वक्त लगता है। खास बात है कि इसे बनाने में किसी भी तरह के केमिकल युक्त रंग का इस्तेमाल नहीं होता है। रंग तैयार करने के लिए अनार के छिलके, हल्दी, इंडिगो, मदार की जड़े, लोहे का घोल और प्राकृतिक पौधे का उपयोग होता है। कई बार कपड़े को धोने, सुखाने और प्राकृतिक प्रक्रिया से तैयार किया जाता है ताकि सालों बाद भी इसका रंग जस का तस रहे।
कलमकारी फैब्रिक की पहचान कैसे करें ?
- यह प्राकृतिक रंगों से तैयार होती है इसलिए मिट्टी जैसी खुशबू आती है
- हाथ से बनी लाइनें पूरी तरह एक जैसी नहीं होती है
- कपड़े के पीछे भी रंग की छाप दिखाई देती है
- GI टैग वाला कमलकारी फैब्रिक खरीदना सेफ विकल्प है
- कलमकारी कपड़ा काफी ज्यादा महंगा होता है
