कई युवा पेशेवर अब मेट्रो शहरों की भागदौड़ छोड़ गोवा में बस रहे हैं। वे रिमोट वर्क के सहारे सुकून भरी 'सुशेगाद' जीवनशैली अपना रहे हैं। इस ट्रेंड से महंगाई और अनियोजित विकास की चिंताएं भी बढ़ रही हैं।

भारत के कई युवाओं के लिए गोवा अब सिर्फ छुट्टियां बिताने की जगह नहीं रहा, बल्कि यह फुल-टाइम लाइफस्टाइल का एक विकल्प बन गया है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर, स्टार्टअप फाउंडर, कलाकार, रिमोट वर्कर और क्रिएटर्स जैसे कई लोग अब भीड़भाड़ वाले मेट्रो शहरों को छोड़कर गोवा के मशहूर 'सुशेगाद' लाइफस्टाइल की तलाश में यहां आ रहे हैं। 'सुशेगाद' का मतलब है- सुकून, शांति और धीमी गति वाली जिंदगी।

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गोवा की पहचान से जुड़ा शब्द 'सुशेगाद' का मोटा-मोटा मतलब एक आरामदायक, संतुष्ट और बिना हड़बड़ी वाली जीवनशैली है। लेकिन यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि अक्सर लोग इसका गलत मतलब निकाल लेते हैं। गोवा के एक कलाकार ने ओ हेराल्डो को बताया, "सुशेगाद का मतलब कुछ न करना नहीं है। इसका मतलब है कि जिंदगी को एक आरामदायक रफ्तार से जीना, बिना किसी लगातार तनाव या जल्दबाजी के।"

यह सोच उन युवा प्रोफेशनल्स को तेजी से अपनी ओर खींच रही है, जो बेंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों के ट्रैफिक, काम के बोझ (बर्नआउट), बढ़ते किराए और कभी न खत्म होने वाली भागदौड़ से थक चुके हैं। बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी और रिमोट वर्क के मौकों ने प्रोफेशनल्स के लिए बीच के किनारे रहते हुए ऑनलाइन अपना करियर जारी रखना आसान बना दिया है।

रेडिट पर, गोवा शिफ्ट हो रहे यूजर्स ने इस बदलाव को "लाइफस्टाइल रीसेट" बताया। एक रिमोट वर्कर ने लिखा, "यहां आपको मेट्रो शहरों की तरह लगातार भागदौड़ महसूस नहीं होती।" एक अन्य यूजर ने लिखा कि वह पढ़ने, कैफे जाने, स्विमिंग करने और शांत शामों से भरी "एकदम चिल, रिटायरमेंट जैसी लाइफ" चाहते हैं।

असागाओ, सिओलिम, अलडोना और साउथ गोवा के कुछ इलाके अब उन लोगों को आकर्षित कर रहे हैं जो लंबे समय तक यहां रहना चाहते हैं। ये लोग नाइटलाइफ़ वाले टूरिज्म की जगह हरियाली, क्रिएटिव कम्युनिटी और एक धीमी दिनचर्या की तलाश में हैं। छोटे-छोटे खूबसूरत कैफे, को-वर्किंग स्पेस और वेलनेस सेंटर्स ने भी युवा शहरी भारतीयों के बीच गोवा की अपील को और बढ़ा दिया है।

हालांकि, गोवा की बढ़ती लोकप्रियता ने बढ़ती महंगाई, अनियोजित विकास और सांस्कृतिक बदलाव जैसी चिंताओं को भी जन्म दिया है। हाल ही में गोवा में रहने के खर्च पर एक चर्चा वायरल हुई थी, जब एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने खुलासा किया कि वह राज्य में अकेले रहने पर हर महीने लगभग 82,000 रुपये खर्च करती है।

स्थानीय लोगों ने भी बढ़ते माइग्रेशन और रियल एस्टेट के विस्तार के बीच गोवा की पहचान को बनाए रखने पर चिंता जताई है। कुछ स्थानीय निवासियों ने ऑनलाइन नए लोगों से अपील की है कि वे स्थानीय संस्कृति का सम्मान करें, कोंकणी सीखें और गोवा को सिर्फ एक "पार्टी स्टेट" समझने की गलती न करें।

इन चुनौतियों के बावजूद, गोवा का भावनात्मक खिंचाव अब भी बहुत मजबूत है। एक ऐसी दुनिया में जहां बर्नआउट और लगातार काम करने का दबाव बढ़ता जा रहा है, इस राज्य की धीमी लय उस पीढ़ी के लिए एक सपना बनती जा रही है जो शांति, फ्लेक्सिबिलिटी और एक बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस की तलाश में है।