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वो आदिवासी नेता, जिनकी जयंती पर जनजातीय गौरव दिवस मना रहा देश, जानिए शहादत से सम्मान तक सब कुछ..

भगवान बिरसा मुंडा देश के इतिहास में ऐसे नायक थे, जिन्होंने जनजाति समाज की दिशा और दशा बदलकर रख दी थी। उन्होंने हमारे वनवासी बंधुओं को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त होकर सम्मान से जीने के लिए प्रेरित किया था। भगवान बिरसा अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' आंदोलन के लोकनायक थे। 

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Bhopal, First Published Nov 14, 2021, 7:00 PM IST
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भोपाल :15 नवंबर देशभर में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाएगा। इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (narendra modi) खुद भी इस दिन मध्यप्रदेश (madhya pradesh) की राजधानी भोपाल (bhopal) में रहेंगे। जहां वे जनजातीय गौरव दिवस महासम्मलेन में भाग लेंगे। अब से हर साल  यह गौरव दिवस मनाया जाएगा, जो सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, वीरता, आतिथ्य और राष्ट्रीय गौरव के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने के आदिवासियों के प्रयासों को मान्यता देगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जनजातीय गौरव दिवस के लिए 15 नवंबर की ही तारीख क्यों चुनी गई। क्या है इसके पीछे की वजह, और कौन हैं वे आदिवासी नेता जिनके बलिदान की हो रही है चर्चा...
  
15 नवंबर की तारीख क्यों चुनी गई
इस दिन को चुनने के पीछे हैं आदिवासी नायक भगवान बिरसा मुंडा। उनकी जयंती 15 नवंबर को मनाई जाती है। इसी को देखते हुए भारत सरकार ने देशभर में 15 नवंबर को 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाने का फैसला किया है। यह उत्सव वीर जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को समर्पित होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां देश के प्रति उनके बलिदानों के बारे में जान सकें। 15 से 22 नवंबर तक 'आजादी के अमृत महोत्सव' के तहत पूरे देश में जनजातीय महोत्सव मनाया जाएगा। जिसके तहत जनजातीय समुदाय के स्वतंत्रता सेनानियों के कृतित्व, उनकी कला और संस्कृति पर कार्यक्रम आयोजित होंगे।

कौन थे बिरसा मुंडा?
भगवान बिरसा मुंडा (Birsa Munda) देश के इतिहास में ऐसे नायक थे, जिन्होंने जनजाति समाज की दिशा और दशा बदलकर रख दी थी। उन्होंने हमारे वनवासी बंधुओं को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त होकर सम्मान से जीने के लिए प्रेरित किया था। भगवान बिरसा अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' आंदोलन के लोकनायक थे। उनका जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड (jharkhand) के खूंटी जिले के उलीहातु गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुगना पूर्ती और माता का नाम करमी पूर्ती था। अपने हक और स्वराज के लिए अंग्रेजों से लड़ते हुए बिरसा मुंडा सिर्फ 25 साल की उम्र में शहीद हो गए थे। ऐसे स्वतंत्रता के महानायक को आज भी संपूर्ण समाज भगवान के तौर पर पूजता है।

अंग्रेजों से लोहा लिया
साल्गा गांव में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद उन्होंने GEL चार्च विद्यालय में पढ़ाई की। उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 1 नवंबर 1894 में उन्होंने सभी मुंडाओं को इकट्ठा किया और लगान माफ करने के लिए आंदोलन शुरू किया। 1895 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल के लिए हजारीबाग जेल में डाल दिया गया। इसके बाद सभी मुंडाओं ने एक होने की ठानी। 1897 से 1900 तक मुंडाओं और अंग्रेजों के बीच युद्ध चलता रहा। अंग्रेज इनके सामने असफल साबित हो रहे थे। अगस्त 1897 में बिरसा ने अपने 400 सैनिकों के साथ तीर-कमान लेकर खूंटी थाने पर हमला बोल दिया। 1898 में तांगी नदी के किनारे मुंडाओं और अंग्रेजों में लड़ाई हुई, जिसमें अंग्रेजी सेना को मुंह की खानी पड़ी। लेकिन इसके बाद उस इलाके के कई आदिवासी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।

25 साल की उम्र में ही शहादत
जनवरी 1900 में डोंबरी पहाड़ी पर एक और युद्ध हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाओं की जान गई। यह वही जगह था, जहां बिरसा मुंडा की जनसभा चल रही थी। इसके बाद बिरसा के कई साथियों की गिरफ्तारियां हुई। 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर जमकोईपाई जंगल से बिरसा को भी अंग्रेजों ने पकड़ लिया। उन्हें रांची कारागार में रखा गया और उन्हें अंग्रेजों की तरफ से जहर दिया गया। जिससे 9 जून 1900 को महज 25 साल की उम्र में ही उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी समाधि रांची के कोकर के पास डिस्टिलरी पुल के पास है।

121 साल 5 महीने बाद जनजातीय गौरव दिवस
बिरसा मुंडा को आदिवासी समाज भगवान की तरह पूजता है। उनके बलिदान के 121 साल 5 महीने बाद उनकी जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने  का फैसला किया गया। इससे इस समाज के लोग काफी खुश हैं। भोपाल में होने वाले आयोजन में 2 लाख से ज्यादा आदिवासियों के जुटने की उम्मीद है। हर स्तर पर तैयारियों को अंतिम रुप दिया जा रहा है।

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