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आतंकवादियों को मुसलमानों का 'Heroes' बताने वाले PFI का सरकार ने खोला काला चिट्ठा, 12 चौंकाने वाले फैक्ट्स

PFI सहित उससे जुड़े 8 संगठनों पर केंद्र सरकार द्वारा 5 साल का बैन लगाने के बाद यह मुद्दा सोशल मीडिया पर ट्रेंड पकड़ा गया है। NIA और ED की छापेमार कार्रवाई के बाद से ही PFI अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए लगातार सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा(propaganda) चला रहा था।

Ban on extremist Islamic organization Popular Front of India, propaganda on social media, terrorism and Modi government's action, shocking facts kpa
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First Published Sep 28, 2022, 11:15 AM IST

नई दिल्ली. चरमपंथी मुस्लिम संगठन पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया(PFI) सहित उससे जुड़े 8 संगठनों पर केंद्र सरकार द्वारा 5 साल का बैन लगाने के बाद यह मुद्दा सोशल मीडिया पर ट्रेंड पकड़ा गया है। NIA और ED सहित तमाम जांच एजेंसियों की (पहला-22 सितंबर और दूसरा 27 सितंबर) छापेमार कार्रवाई के बाद से ही PFI अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए लगातार सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा(propaganda) चला रहा था। जिन लोगों को आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने पर अरेस्ट किया गया है, संगठन उन्हें 'हीरो'बताकर मुसलमानों को सरकार के खिलाफ भड़काने मे लगा था। इस बीच केंद्र सरकार ने PFI पर बैन लगाने के पीछे तमाम ठोस कारण गिनाए हैं। पढ़िए सरकार ने नोटिफिकेशन में क्या लिखा...

पहली तस्वीर PFI ने अपने twitter पर पोस्ट करते हुए लिखा था-आइए अपने #HeroesOfUmmah के साथ खड़े हों। फासीवाद(fascism) के खिलाफ। उन्होंने जो लड़ाई आगे रखी है, वह हमेशा वैसी ही रहेगी। उम्माह मतलब समुदाय।

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खुद को सोशल एक्टिविस्ट और इस्लामिक विद्वान बताने वाले एक twitter यूजर तारिक शेख(@Tarique_Baber) ने यह तस्वीर शेयर करते हुए लिखा-पीएफआई के साथ खड़े होने का समय आ गया है तो प्लीज#StandwithPFI और अपनी आवाज उठाएं और सरकार से मांग करें #ReleasePFILeaders


पढ़िए PIF और उससे जुड़े 8 संगठनों पर बैन के पीछे सरकार ने क्या दिए तर्क

पहले जानें इनके रजिस्ट्रेशन के बारे में- गृहमंत्रालय ने PFI पर बैन लगाने की प्रोसेस 27 सितंबर को ही पूरी कर ली थी। 28 सितंबर को नोटिफिकेश जारी किया गया। इसमें लिखा गया- पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (जिसे पीएफआई कहा गया) को सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अंतर्गत पंजीकरण संख्या एस/226 / जिला दक्षिण/2010 के तहत दिल्ली में रजिस्टर्ड कराया गया था। रिहैब इंडिया फाउंडेशन (आरआईएफ ) ( पंजीकरण संख्या 1352, दिनांक 17.03.2008).... कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई), आल इंडिया इमाम काउंसिल (एआईआईसी), नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन (एनसीएचआरओ) (पंजीकरण संख्या एस-3256, दिनांक 12.09.2010)... नेशनल विमेंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट एम्पावर इंडिया फाउंडेशन (पंजीकरण संख्या के सीएच-IV-00150/2016-17, दिनांक 02.12.2016) रिहैब फाउंडेशन, केरल (पंजीकरण संख्या 1016/91) सहित इसके कई सहयोगी संगठन या सम्बद्ध संस्थाएं या अग्रणी संगठन हैं।

जांच में पीएफआई और इसके सहयोगी संगठन या सम्बद्ध संस्थाओं या अग्रणी संगठनों के बीच स्पष्ट तौर पर सम्बंध पता चले हैं। रिहैब इंडिया फाउंडेशन, पीएफआई के सदस्यों के माध्यम से धन जुटाता है और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन, रिहैब फाउंडेशन, केरल के कुछ सदस्य पीएफआई के भी सदस्य हैं तथा पीएफआई के नेता जूनियर फ्रंट आल इंडिया इमाम काउंसिल, नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन (एनसीएचआरओ) और नेशनल विमेंस फ्रंट की गतिविधियों की निगरानी / समन्वय करते हैं।

बैन करने के पीछे ये दिए गए तर्क
1.
PFI ने समाज के विभिन्न वर्गों जैसे युवाओं, छात्रों, महिलाओं, इमामों, वकीलों या समाज के कमजोर वर्गों के बीच अपनी पहुंच को बढ़ाने के उद्देश्य से अपने सहयोगी संगठनों या सम्बद्ध संस्थाओं या अग्रणी संगठनों की स्थापना की है, जिसका एकमात्र उद्देश्य इसकी सदस्यता, प्रभाव और फंड जुटाने की क्षमता को बढ़ाना है।

2. ये सभी संगठन  PFI के बीच हब और स्पोक जैसा संबंध है। इसमें  PFI 'हब' के रूप में कार्य करते हुए सहयोगी संगठनों के जरिये जनता के बीच पहुंच और फंड जुटाने की क्षमता का उपयोग गैर कानूनी कामों में अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए करता है।

3. PFI और उसके सहयोगी संगठन जड़ और शिराओं की तरह भी कार्य करते हैं, जिनके माध्यम से  PFI को पैसा एवं शक्ति प्राप्त होती है।

4. PFI और इसके सहयोगी संगठन एक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संगठन के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन ये गुप्त एजेंडा के तहत समाज के एक वर्ग विशेष को कट्टर बनाकर लोकतंत्र की अवधारणा को कमजोर करने की दिशा में कार्य करते हैं। ये देश के संवैधानिक प्राधिकार और संवैधानिक ढांचे(Constitutional Authority and Constitutional Framework) के प्रति घोर अनादर दिखाते हैं।

5.PFI और इसके सहयोगी संगठन  गैर कानूनी क्रियाकलापों में संलिप्त रहे हैं, जो देश की अखंडता, सम्प्रभुता और सुरक्षा के प्रतिकूल हैं। इससे शांति तथा साम्प्रदायिक सदभाव का माहौल खराब होने और देश में उग्रवाद को प्रोत्साहन मिलने की आशंका है।

6. PFI के कुछ संस्थापक सदस्य स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के नेता रहे हैं तथा PFI का सम्बन्ध जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMC) से भी रहा है, ये दोनों संगठन प्रतिबंधित संगठन हैं।

7. PFI के इंटरनेशनल टेरोरिस्ट ग्रुप्स, जैसे कि इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) के साथ सम्पर्क के कई उदाहरण हैं।

8. PFI और इसके सहयोगी संगठन या इससे जुड़ीं संस्थाएं या अग्रणी संगठन चोरी-छिपे देश में असुरक्षा की भावना को बढ़ावा देकर एक समुदाय के कट्टरपंथ को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इसके कुछ सदस्य अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठनों से जुड़ चुके हैं। PFI के कुछ सदस्य आईएसआईएस में शामिल हुए हैं और सीरिया, ईराक और अफगानिस्तान में आतंकी कार्यकलापों में भाग लिए हैं। 

9.  केंद्रीय सरकार का यह मत है कि इन कारणों को देखते हुए  विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967(Unlawful Activities (Prevention) Act) (1967 का 37) की धारा 3 की उप-धारा (1) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करना आवश्यक है।

10. PFI कई आपराधिक और आतंकी मामलों में शामिल रहा है और यह देश की संवैधानिक अथॉरिटी का अनादर करता है। यह बाहरी स्रोतों से प्राप्त धन और वैचारिक समर्थन के साथ यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।

11. विभिन्न मामलों में जांचों से यह स्पष्ट हुआ है कि PFI और इसके काडर बार-बार हिंसक और विध्वंसक कार्यों में संलिप्त रहे है। जिनमें एक कॉलेज प्रोफेसर का हाथ काटना, अन्य धर्मों का पालन करने वाले संगठनों से जुड़े लोगों की निर्मम हत्या करना, प्रमुख लोगों और स्थानों को निशाना बनाने के लिए विस्फोटक प्राप्त करना, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना आदि शामिल हैं।

12. PFI काडर कई आतंकवादी गतिविधियों और कई व्यक्तियों जैसे-संजीत (केरल, नवम्बर, 2021),वी. रामलिंगम (तमिलनाडु, 2019 ), नंदू (केरल, 2021), अभिमन्यु (केरल, 2018), बिबिन (केरल 2017), शरत (कर्नाटक 2017), आर. रुद्रेश ( कर्नाटक 2016), प्रवीण पुजारी (कर्नाटक 2016) शशि कुमार (तमिलनाडु, 2016) और प्रवीण नेत्तारू ( कर्नाटक, 2022) की हत्या में शामिल रहे हैं। ऐसे अपराधिक कृत्य और जघन्य हत्याएं, सार्वजानिक शांति को भंग करने और लोगों के मन में आतंक का भय पैदा करने के एकमात्र उद्देश्य से की गई हैं। 

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