Amar Jawan Jyoti Shifting News : अमर जवान ज्योति को इंडिया गेट से हटाने पर विवाद छिड़ गया है। कुछ लोग सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं तो तमाम लोग समर्थन में हैं। इस बीच एशियानेट न्यूज ने पूर्व सैन्य अफसरों से इस फैसले पर राय ली। 

नई दिल्ली। अमर जवान ज्योति (Amar Jawan Jyoti Shifting) को इंडिया गेट से हटाकर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (National War Memorial) के पास जल रही ज्योति में समाहित करने के फैसले की पूरे देश में चर्चा है। कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया है तो भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप है कि राहुल गांधी समेत विरोध करने वाले तमाम नेता अमर जवान ज्योति की शिफ्टिंग को लेकर झूठा प्रचार कर रहे हैं। इस बीच, 1965 और 1971 में भाग लेने वाले जाबांजों ने भी फैसले के प्रति सहमति नहीं दिखाई है। ऐसे ही कुछ पूर्व सैनिकों से एशियानेट न्यूज ने बात की। पढ़ें, इन्होंने क्या कहा... 

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

अमर जवान ज्योति 1971 के युद्ध के बाद अस्तित्व में आई। यह सिर्फ उन बहादुर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए है, जिन्होंने हमारे भविष्य के लिए अपना वर्तमान बलिदान कर दिया। यह हमारे उन्हीं जवानों को सम्मान देने के लिए है। वर्तमान सरकार इसे मिलाने करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि यह उनकी विरोधी पार्टियों द्वारा बनाई गई थी। इसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। अगर यह फैसला सिर्फ इसी सोच के साथ लिया गया है तो यह बड़े दुख की बात है। - कर्नल दिनेश सिंह (रिटायर्ड) 

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और अमर जवान में निरंतर लौ जलाए रखी जा सकती है। एक को बुझाने और दूसरे में मिलाने जैसा कुछ नहीं होना चाहिए। अमर जवान ज्योति अपने आप में एक प्रतीक है। उस लौ को बुझाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यह हमारे इतिहास का एक हिस्सा है। इंडिया गेट ब्रिटिश औपनिवेशिक संरचनाओं में से एक हो सकता है, लेकिन विभिन्न युद्धों में अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों के नाम भारतीय हैं। अमर जवान ज्योति विशेष रूप से 1971 के युद्ध के लिए बनाई गई थी। आप 1971 के युद्ध की स्मृति को यहां से मिटा नहीं सकते। कर्नल राजेंद्र भादुड़ी (रिटायर्ड)

रिटायर्ड कर्नल भादुड़ी कहते हैं- वर्षों से जल रही लौ को बुझाने का क्या कारण है। सोवियत देशों में ऐसी ही लपटें छिन्न भिन्न हो गईं, क्योंकि पूर्व सोवियत संघ के देश पुरानी सोवियत विरासत के साथ अपनी पहचान नहीं चाहते थे। लेकिन भारत में क्या तर्क है। हमारे पास सोवियत की तरह कोई विरासत नहीं है। हमारे यहां दो लपटें हो सकती हैं। जब तक यह सरकार पुरानी विरासत को मिटाने और नया बनाने की कोशिश नहीं करती, मुझे कोई तर्क नहीं दिखता। 

2019 में सरकार ने कहा था - नहीं बुझाएंगे, तीन वर्ष में क्या बदल गया
कर्नल भादुड़ी कहते हैं कि कुछ साल पहले 2019 में इस सरकार ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि अमर जवान ज्योति को अलग से राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के बावजूद बंद नहीं किया जाएगा। पिछले तीन वर्षों में क्या बदल गया है? यह तर्क नहीं हो सकता कि गैस बर्बाद हो रही है। ज्योति (लौ) के बिना इंडिया गेट पर अब अमर जवान स्मारक का क्या महत्व है? यह पूरी तरह से अपना महत्व खो देता है। दिल्ली में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बन गया है, तो क्या रेजांग ला युद्ध स्मारक को तोड़ा गया? 
राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में सभी सैनिकों के नाम अंकित हैं, तो क्या वे देश भर में अन्य सभी युद्ध स्मारकों को तोड़ा जा रहा है? आखिर लौ को मिलाने का तर्क क्या है? अगर यह राजनीति है तो यह शर्मनाक है। मुझे नहीं पता कि कौन है इस विचार के साथ आया है। यह पचाना मुश्किल है कि क्या हो रहा है। 


लौ उन सभी सैनिकों के योगदान की याद दिलाती है, जो युद्धों के दौरान शहीद हो गए। यह विश्व युद्धों के दौरान भारतीय सेना के योगदान के लिए एक श्रद्धांजलि है। एक तरह से यह वैश्विक युद्धों में और 1971 के युद्ध के दौरान भी भारतीय सैन्य टुकिड़यों के योगदान का प्रतीक है। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की स्थापना के साथ, सरकार ने दोनों को अलग-थलग कर दिया है। अब केवल राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में ही ज्योति जलाई जाएगी। मैं इससे सहमत नहीं हूं। आप इतिहास को हटा नहीं सकते। तथ्य यह है कि वे प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किए गए योगदान थे। लड़ने वाले सैनिक सभी वर्गों, जातियों, पंथों, क्षेत्रों से थे। एक पूर्व भारतीय वायु सेना अधिकारी के रूप में मैं इस निर्णय से सहमत नहीं हूं। नए युद्ध स्मारक और अन्य इंडिया गेट देनों जगह ज्योति जारी रहनी चाहिए थी। क्योंकि अमर जवान ज्योति का नया युद्ध स्मारक स्थापित होने से पहले 70 साल का अपना महत्व है। एयर वाइस मार्शल कपिल काक (रिटायर्ड)

एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (रिटायर्ड) कहते हैं कि इंडिया गेट पर जल रही लौ ऐतिहासिक नहीं, राष्ट्र-निर्माण के प्रतीकों का एक अमूर्त मूल्य है। 1971 के युद्ध के आसपास एक पीढ़ी बड़ी हुई। इस हटाने से हम सभी व्यक्तिगत रूप से अपने जीवन का एक हिस्सा खो देंगे। उन्होंने कहा कि कॉमनवेल्थ ग्रेव्स कमीशन प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के लिए दुनिया भर में कब्रों का रखरखाव करता है। वह और ऐसा करना जारी रखेगा। यह अफसोस की बात है कि प्रतिष्ठित इंडिया गेट पर हमारी 'शाश्वत लौ' बुझ रही है। इसके साथ एक पीढ़ी बड़ी हुई है। कितना दुखद दिन है!

यह भी पढ़ें
मोदी का ऐलान-इंडिया गेट पर लगेगी नेताजी की भव्य मूर्ति; संडे को करेंगे सिम्बोलिक होलोग्राम मूर्ति का अनावरण
नेताजी की 28 फीट ऊंची और 6 फीट चौड़ी ग्रेनाइट मूर्ति बदलने जा रहा 'इंडिया गेट' का इतिहास, जानिए कुछ फैक्ट्स