हिमाचल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी है, जिसमें कीलोंग और पांगी में पंचायतों को कार्यकाल से पहले भंग कर दिया गया था। कोर्ट ने चुने हुए प्रतिनिधियों को अगले आदेश तक पद पर बने रहने की अनुमति दी है।
शिमला (हिमाचल प्रदेश) [भारत], 1 जुलाई (एएनआई): हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना के अमल पर रोक लगा दी है, जिसके तहत लाहौल और स्पीति जिले के कीलोंग और चंबा जिले के पांगी के आदिवासी क्षेत्रों में कई पंचायती राज संस्थानों (पीआरआई) को भंग कर दिया गया था। कोर्ट के इस आदेश के बाद चुने हुए प्रतिनिधि अगले आदेश तक अपने पद पर बने रहेंगे।

मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की 24 जून की अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। इस अधिसूचना के जरिए दोनों आदिवासी क्षेत्रों में मौजूदा ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों को उनका पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ताओं को अपना संवैधानिक कार्यकाल पूरा करने का निहित अधिकार है और निर्देश दिया कि उन्हें और इसी तरह के अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को अगले आदेश तक काम करने की अनुमति दी जाए।
क्यों पैदा हुआ विवाद?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब राज्य चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए 26, 28 और 30 मई, 2026 को कीलोंग और पांगी में नए पंचायती राज चुनाव कराए। सुप्रीम कोर्ट ने 31 मई, 2026 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। हालांकि, मौजूदा निर्वाचित निकाय, जिन्होंने अक्टूबर 2021 में हुए चुनावों के बाद पद संभाला था, उनका पांच साल का कार्यकाल मूल रूप से 17 अक्टूबर, 2026 को पूरा होना था।
मौजूदा और नवनिर्वाचित निकायों के बीच कार्यकाल के इस ओवरलैप को दूर करने के लिए, राज्य सरकार ने 24 जून, 2026 को एक अधिसूचना जारी की। इसमें हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 120(4) का इस्तेमाल करते हुए मौजूदा स्थानीय निकायों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया और नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों की पहली बैठक 18 अक्टूबर से पहले 27 जून, 2026 को ही बुला ली गई।
कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील विनय शर्मा ने तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 243ई प्रत्येक पंचायत को उसकी पहली बैठक की तारीख से पांच साल के कार्यकाल की गारंटी देता है और एक निर्वाचित निकाय के कार्यकाल को बाद में किए गए किसी विधायी संशोधन के जरिए पूर्वव्यापी प्रभाव से कम नहीं किया जा सकता है।
राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता गोबिंद कोरला ने हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2026 के माध्यम से जोड़ी गई धारा 120(4) का हवाला देते हुए अपने फैसले का बचाव किया। राज्य ने तर्क दिया कि अप्रत्याशित घटनाओं या चुनाव बहिष्कार के कारण बाद में गठित पंचायतों का कार्यकाल भी राज्य के बाकी हिस्सों की पंचायतों के साथ ही चलना चाहिए, जहां जनवरी 2021 में चुनाव हुए थे। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह संशोधन जनवरी 2026 में लागू हुआ था, और इसे 2021 में चुने गए प्रतिनिधियों का कार्यकाल कम करने के लिए पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और आदेश
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पहली नजर में अपना पक्ष साबित कर दिया है और सरकार की कार्रवाई निर्वाचित प्रतिनिधियों को उनके कार्यकाल को पूरा करने के निहित अधिकार से वंचित करती हुई प्रतीत होती है। पीठ ने यह भी कहा कि इस मामले में व्यापक जनहित शामिल है और राज्य द्वारा चुनाव कार्यक्रम में किए गए बदलाव ने याचिकाकर्ताओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
इसके परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने 24 जून की अधिसूचना के संचालन पर रोक लगा दी और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं और अन्य समान रूप से स्थित निर्वाचित प्रतिनिधियों को अगले आदेश तक पद पर बने रहने दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त, 2026 को होगी। (एएनआई)
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