इंडिगो संकट के बीच CEO के रोबोटिक माफीनामे ने सोशल मीडिया पर विवाद खड़ा कर दिया। यात्रियों का गुस्सा सिस्टम फेलियर पर नहीं, बल्कि एयरलाइन की चुप्पी और खराब कम्युनिकेशन पर फूटा। क्या इंडिगो को अब कम्युनिकेशन मॉडल बदलना होगा?

नई दिल्ली। इंडिगो संकट ने देशभर में यात्रियों की यात्रा योजनाओं को अस्त-व्यस्त कर दिया, लेकिन असली तूफान तब आया जब एयरलाइन के CEO पीटर एल्बर्स का माफीनामा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में उनका टोन इतना सपाट, भावहीन और रोबोटिक दिखा कि लोग इसे असली माफी मानने को तैयार नहीं थे। लिंक्डइन और एक्स पर हजारों कमेंट्स आए, जहां यूजर्स ने लिखा कि यह मानो किसी AI बॉट द्वारा पढ़ा गया संदेश था, ना कि देश की सबसे बड़ी एयरलाइन के प्रमुख की प्रतिक्रिया।

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CEO की 'रोबोट जैसी' माफ़ी पर सोशल मीडिया इतना क्यों भड़का?

शुक्रवार को जारी इस वीडियो में CEO पीटर एल्बर्स की बॉडी लैंग्वेज और टोन लोगों को बिलकुल भी पसंद नहीं आई। लिंक्डइन पर शक्ति वडक्केपट ने लिखा कि इंडिगो CEO को "रोबोट की तरह सबसे बेसुरी और बेहिसाब माफ़ी पढ़ने" का अवॉर्ड मिलना चाहिए। इस कमेंट के बाद तो जैसे कमेंट्स की बाढ़ आ गई। यूजर्स का कहना था कि संकट के समय लोग इमोशन और सही कम्युनिकेशन चाहते हैं, न कि मशीन जैसी पढ़ी हुई स्क्रिप्ट।

क्या समस्या सिस्टम की थी, या कम्युनिकेशन की सबसे बड़ी गलती हुई?

शक्ति वडक्केपट, जो AI–ML और टेक में काम करते हैं, ने इस पूरे मुद्दे को एक अलग एंगल से समझाया। उन्होंने लिंकडाइन पर लिखा कि कोई भी कॉम्प्लेक्स सिस्टम तभी फेल होता है जब उसके हिस्से आपस में कम्युनिकेशन बंद कर देते हैं। एक मजबूत आर्किटेक्चर भी तब खराब हो जाता है जब इंटीग्रेशन पॉइंट एक साथ काम नहीं करते। और जब कम्युनिकेशन लेयर शांत हो जाती है, तो पूरा कस्टमर एक्सपीरियंस बर्बाद हो जाता है। असल में, यात्री इसलिए नाराज नहीं थे कि सिस्टम फेल हुआ। वे इसलिए नाराज थे क्योंकि किसी ने यह नहीं बताया कि सिस्टम फेल क्यों हुआ।

क्या इंडिगो संकट ने दिखा दिया कि चुप्पी ही सबसे बड़ी गलती थी?

एविएशन और टेक्नोलॉजी में एक बड़ा नियम बताया गया कि लेटेंसी (देरी) को कोई बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन चुप्पी को नहीं। अगर किसी संगठन की कम्युनिकेशन लेयर रियल-टाइम सिग्नल, क्लियर अपडेट और ट्रांसपेरेंसी दे, तो बड़ी समस्या भी संभाली जा सकती है। पर इंडिगो के केस में ऐसा नहीं हुआ।

क्या AI मॉडल की तरह ऑर्गनाइजेशन को भी 'फीडबैक लूप' की जरूरत है?

शक्ति ने मजाक में लिखा कि अगर कोई ML मॉडल कल की तरह काम करता, तो उसे “मॉडल ड्रिफ्ट” कहलाकर तुरंत ठीक किया जाता। लेकिन जब इंसान ऐसा करते हैं, तो उसे “ऑपरेशनल चैलेंज” कहा जाता है। उनका कहना है कि कंपनियों को भी AI की तरह लगातार फीडबैक लूप, ट्रांसपेरेंट लॉग, और नो-साइलेंट फेलियर को अपनाना चाहिए। यही “ह्यूमन-सेंट्रिक आर्किटेक्चर” बनाता है।

क्या इंडिगो ने स्टाफ के लिए काउंसलिंग या सपोर्ट सिस्टम तैयार किया?

कई यूजर्स ने यह भी सवाल उठाया कि इतने गुस्से वाले यात्रियों और तनावपूर्ण माहौल के बाद, क्या इंडिगो ने अपने स्टाफ के लिए कोई काउंसलिंग या सपोर्ट की व्यवस्था की? क्योंकि फ्रंटलाइन टीम पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ा।

क्या यह संकट टेक्निकल था या कम्युनिकेशन का फेलियर?

इस पूरे मुद्दे ने साफ कर दिया है कि समस्या चाहे कितनी भी बड़ी हो, कम्युनिकेशन न हो तो हर चीज संकट बन जाती है। यात्रियों को सिर्फ यह चाहिए था कि एयरलाइन उन्हें बताए कि क्या हुआ और क्यों हुआ। सवाल अब भी वही है कि सिस्टम फेल हुआ था या कम्युनिकेशन फेल हुआ? ऐसे तमाम सवाल यूजर्स पूछ रहे हैं और कमेंट कर रहे हैं।